श्रीकृष्ण का दौत्य-२ | Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty

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Mahabharat Krishna Ka Hastinapur Aagmaan Ki Kahani

Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty-2
महाभारत स्टोरी हिंदी:  श्रीकृष्ण का दौत्य-२

स्तिनापुर में श्रीकृष्ण-आगमन का समाचार जंगल में आग की तरह फैल गया। धृतराष्ट्र को यह खबर जैसे ही मिली, उन्होंने भीष्म, द्रोण, संजय, विदुर तथा दुर्योधन को बुला भेजा। उनके आ जाने पर निर्देश देते हुए उन्होंने कहा, "आज हस्तिनापुर में कृष्ण आ रहा है, इसलिए उसके स्वागत में यहाँ के सभी मार्गों और वीथियों को तोरण और वन्दनवार से सजा दो। स्थान-स्थान पर आवश्यक सुविधाओं का प्रबन्ध कर दो। ध्यान रखो, उसके स्वागत-सत्कार में कोई त्रुटि न रहे।"


महाराज धृतराष्ट्र के आदेशानुसार दुर्योधन ने हस्तिनापूर के सभी मार्गों के अतिरिक्त वृकस्थल तक जाने वाले पथ को भी अलंकृत द्वारों और पताकाओं से सजा दिया।


श्रीकृष्ण इन सजावटों की ओर बिना ध्यान दिये हस्तिनापुर पहुंच गये। दुर्योधन को छोड़ कर धृतराष्ट्र के अन्य सभी पुत्र भीष्म और द्रोण के साथ अपने-अपने रथ पर उनके स्वागत के लिए आये।


श्रीकृष्णने धृतराष्ट्र के महल के सामने अपना रथ रोक दिया और पैदल ही उनकी राजसभा में पहुंचे। इनके पहुंचते ही धृतराष्ट्र सहित सभी राजे तथा अधिकारी इनके सम्मान में खड़े हो गये।


श्रीकृष्ण ने सबसे पहले भीष्म और धृतराष्ट्र से उनका कुशल-क्षेम पूछा। बाद में अन्य सभी राजाओं और उपस्थित व्यक्तियों से उनकी उम्र के अनुसार बातचीत की। 


धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण को स्वर्ण आसन पर बिठाया। श्रीकृष्ण ने उनका आतिथ्य स्वीकार किया और कुछ देर उनसे बातें कर, विदुर के घर चले गये।


उसी दिन अपराह वे कुन्ती से भी मिलने गये। उन्होंने श्रीकृष्ण को गले से लगा लिया और अपने पुत्रों का कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा,"कृष्ण! मेरे पुत्र मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर वन चले गये। जिन पितृहीन बच्चों को मैंने इतने प्यार से पाला था, भयंकर वन में उन्होंने अपना जीवन कैसे बिताया होगा। धर्मराज, भीम, अर्जुन सकुशल तो हैं? नकुल, सहदेव और कोमलांगी द्रौपदी कैसी हैं? मैं उन्हें कब देख पाऊंगी? तुम्हारे होते हुए भी धर्म परायण आत्माओं की यह दुर्दशा!'' यह कहते-कहते कुन्ती की आँखों में आँसू आ गये।


श्रीकृष्ण ने कुंती को सान्त्वना दी और कहा कि शीघ्र ही तुम्हारे सभी पुत्र, पुत्रवधू और अपने राज्याधिकार के साथ तुमसे मिलेंगे। थोड़ा और धैर्य रखो।


कुन्ती से विदा लेकर वे दुर्योधन से मिलने चले गये। दुर्योधन का महल इन्द्रपुरी के समान भव्य था। वह एक विशाल अलंकृत कक्ष में रत्नजटित सिंहासन पर गर्व के साथ बैठा हुआ था। दुःशासन, कर्ण और शकुनि भी उसके समीप बैठे थे। श्रीकृष्ण के आते ही सब के सब उठ खड़े हुए। दुर्योधन ने उन्हें उनके लिए विशेष रूप से सुसज्जित एक आसन पर बैठाया। 


श्रीकृष्ण ने दुर्योधन तथा वहाँ उपस्थित सभी से कुशल-मंगल पूछा। दुर्योधन ने उस रात अपने ही महल में भोजन और विश्राम कर आतिथ्य स्वीकार करने की उनसे प्रार्थना की। लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी विवशता बताकर उसकी प्रार्थना ठुकरा दी।


इस पर दुर्योधन ने पुनः अनुरोध करते हुए कहा,-"कृष्ण, तुमने तो निष्पक्ष रह कर कौरवों और पांडवों दोनों की सहायता की। इसलिए मैं हृदय से अपना आतिथ्य स्वीकार करने के लिए तुमसे प्रार्थना कर रहा हूँ। फिर क्या कारण है कि तुम इसे ठुकरा रहे हो?"


"मैं यहाँ दूत बन कर आया हूँ। और जब तक मेरा उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक तुम्हारा आतिथ्य नहीं स्वीकार कर सकता।" श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया।


"तुम्हारा उद्देश्य पूरा हो या न हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति में मेरा कोई योगदान होगा, ऐसी धारणा मत बना लेना। तुम हस्तिनापुर आये हो तो इसलिए, तुम्हें आतिथ्य-सत्कार और सम्मान देना हमारा कर्तव्य है। तुम्हें हमारा अनुरोध स्वीकार करना ही चाहिए।" दुर्योधन ने औपचारिक भाव से कहा।


दुर्योधन के मनोभाव को ताड़ कर श्रीकृष्ण मुस्कुराये और बोले,-"दो तरह के व्यक्तियों के साथ भोजन करने का आनन्द है। प्रेम करने वालों के साथ और विपत्ति में फंसे लोगों के साथ हमारे प्रति तुम्हारे हृदय में प्रेम नहीं है। अपने ही परिवार के पांडवों के प्रति तुममें जरा भी प्यार नहीं है। तुम उनसे अकारण द्वेष करते हो और अपना शत्रु मानते हो। उनके धर्मानुसार आचरण पर किसी ने उंगली नहीं उठाई। इसीलिए वे हमें प्रिय हैं। उनसे शत्रुता का अर्थ है मुझसे शत्रुता। सच तो यह है कि आतिथ्य के लिए मुझ से तुम्हारा अनुरोध ही अनुचित है।"


इतना कह कर श्रीकृष्ण वहाँ से उठकर विदुर के घर चल पड़े और वहीं भोजन किया।


भोजन के उपरान्त विदुर ने श्रीकृष्ण से कहा,"कृष्णा लगता है, यहाँ आकर तुमने ठीक नहीं किया दुर्योधन का मन सभी कर्तव्यों और मूल्यों को अलग रख कर सिर्फ युद्ध पर टिका हुआ है। कर्ण का दंभ है कि वह अकेला ही सभी पांडवों को परास्त करने के लिए काफी है। इसलिए यह शांति का विरोधी है। कर्ण के बल पर दुर्योधन भी युद्ध के लिए मचल रहा है। इसके अतिरिक्त उसकी सेना की शक्ति भी बहुत अधिक है। 


उसके पक्ष के राजे तुम्हारे पुराने शत्रु हैं। इसलिए वे सभी तुम्हारी हर बात का विरोध करेंगे, चाहे तुम कुछ उनके भले के लिए ही क्यों न कहो। यद्यपि तुम्हारी शक्ति पर मुझे पूरा विश्वास है, फिर भी मैं चाहता हूँ कि तुम उनके समझ जाओ ही नहीं।"


विदुर से सहमत होते हुए श्रीकृष्ण ने कहा,"मित्र के स्नेह के नाते तुमने ठीक ही परामर्श दिया है। तुमने जो कहा है, वही होगा भी। फिर भी, यह मेरा धर्म है कि शांति के लिए और उभय पक्षों को विनाश से बचाने के लिए मैं भरसक प्रयास करूं। हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाना उचित नहीं होगा। यदि ऐसा नहीं किया तो संसार मुझ पर यह दोषारोपण करेगा कि मैंने ही दोनों पक्षों को सर्वनाश की ज्वाला में झोंक दिया। जहाँ तक उनके सामने जाने से मुझ पर संकट आने का प्रश्न है, उसकी तुम चिंता मत करो।"


उस रात श्रीकृष्ण ने विदुर के घर पर ही विश्राम किया। दूसरे दिन प्रातःकाल दैनिक दिनचर्या से निवृत हो जैसे ही श्रीकृष्ण रथ की ओर बढे कि धृतराष्ट्र की ओर से दुर्योधन और शकुनि उन्हें राजसभा में ले जाने के लिए आ गये। उनके साथ अनेक राजा भी हाथियों व घोड़ों पर सवार होकर आये थे। उन सब के बीच राजमार्ग पर जाते हुए अपने रथ पर सवार श्रीकृष्ण ऐसे शोभित हो रहे थे मानो सितारों के बीच पूर्व क्षितिज-पट पर चन्द्रमा उदित हो रहा हो। इस मनोहर दृश्य को देखने के लिए स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभी मार्गों व घर के परकोटों पर उमड़ पड़े।


धृतराष्ट्र की राजसभा के मुख्य द्वार पर श्रीकृष्ण के संकेत पर सारथि दारुक ने रथ रोक दिया। सात्यिकी और विदुर के साथ श्रीकृष्ण ने सभा में प्रवेश किया। समस्त सभासदों ने खड़े होकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया और सम्मान के साथ विशिष्ट आसन पर बैठाया। विदुर और सात्यिकी ने इनके समीप ही अपना आसन ग्रहण किया।


सभा में थोड़ी देर तक मौन छाया रहा। सब की दृष्टि श्रीकृष्ण पर टिकी थी। श्रीकृष्ण ने बारीबारी से सबके ऊपर दृष्टि डाली। धृतराष्ट्र पर नजर पढ़ते ही उन्हें सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा,"यद्यपि कौरवों और पांडवों दोनों की ओर से युद्ध की तैयारियाँ हो चुकी हैं, फिर भी राजन! मैं पांडवों की ओर से आप के पास शांति का सन्देश लाया हूँ। पांडव यद्यपि शान्ति के पक्ष में नहीं हैं, फिर भी युद्ध की भीषण विभीषिकाओं को देखते हुए. मैं उन्हें शान्ति के लिए मना लूंगा।


"भारत के सभी राजवंशों में कुरु वंश सर्वश्रेष्ठ है और आप उस वंश के शीर्ष हैं। यदि युद्ध हुआ तो कुरुवंश के विनाश के साथ-साथ सभी राजवंशों का विनाश हो जायेगा और इसका कलंक आप पर लगेगा। यदि आप के वंश का कोई व्यक्ति अधर्म करे, नीति विरुद्ध कार्य करे तो उसे दण्ड देना आप का अधिकार और धर्म है।


"आप के पुत्रों ने धर्म की सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित का विवेक खो दिया। पाण्डवों पर अमानवीय अत्याचार किये। वे समर्थ होते हुए भी मेरे कहने पर यह सब सहते रहे। यह सब आप जानते हैं। यदि युद्ध का विनाशकारी संकट आया तो इसका दायित्व कौरवों पर होगा। लेकिन आप चाहें तो कुरु वंश को बचा सकते हैं। आप चाहें तो कौरवों और पांडवों के बीच शान्ति की स्थापना कर सकते हैं। आप अपने पुत्रों को अनुचित और धर्म विरुद्ध कार्य करने से रोक सकते हैं। उन्हें सन्मार्ग पर चलने का आदेश दे सकते हैं। यह सब करने का अधिकार आप को है। आप उन्हें अपने न्यायपूर्ण आदेश का पालन करने पर बाध्य कर सकते हैं, आप उनके पिता और सम्राट हैं।


"पांडवों को युद्ध में कोई भी नहीं जीत सकता। वे अजेय हैं। यदि युद्ध नहीं हुआ और आपने पांडवों के साथ सन्धि कर ली तो इससे आप का ही हित साधित होगा। जब तक पांडव आप के साथ रहेंगे, तब तक आप इस पृथ्वी पर निष्कंटक राज्य करेंगे, क्योंकि उन्हें परास्त करने वाली कोई शक्ति अभी तक धरती पर नहीं उतरी। और यदि युद्ध हुआ तो आप को कोई लाभ नहीं होगा, चाहे कोई भी जीते। 


इस युद्ध में संसार के सभी राजा भाग लेंगे और युद्ध की ज्वाला में कीटों की तरह मर मिट जायेंगे। संसार वीरों से खाली हो जायेगा। आप चाहें तो संसार को इस विनाश से बचा सकते हैं।


“आप अपने पुत्रों को सन्मार्ग पर लाइ मैं पांडवों की क्रोधाग्नि को शान्त करूंगा। इस प्रकार शान्ति संभव है।


"फिर, पितृहीन पांडवों का आप के सिवा कौन अपना है! संकट के समय वे किसके पास जायें? वे भी आप के ही संतान हैं। वैसे भी उन्होंने आप का और आप के पुत्रों का क्या बिगाडा है? आप जानते ही हैं कि धर्मराज कैसा सरल हृदय है। लाख के महल में जलाया गया तब भी वह आप के पास आया। आपने उसे इन्द्रप्रस्थ भेज दिया तो वह चुपचाप चला गया। शकुनि ने उसे धोखे से छला फिर भी उसने अपने वचन का पालन किया।


"और अन्त में पूरी सभासे कौरवों और पांडवों के हित को ध्यान में रख कर याचना करता हूँ कि पांडवों के पिता का आधा राज्य न्याय और धर्मपूर्वक उन्हें लौटा दें और कुरु वंश के साथ-साथ सभी राजवंशों को सर्वनाश से बचा लें। और यहाँ उपस्थित सभी राजा एक साथ बैठकर प्रेम के साथ भोजन करें और पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और शत्रुता त्याग कर अपने-अपने राज्य लौट जायें।


"लेकिन यदि सभा ने अधर्म और अन्यायपूर्ण निर्णय लिया तो तजनित पाप के भागी ये सभी होंगे जो ऐसे निर्णय के साक्षी होंगे।


"मैं हर प्रकार से सोच-विचार कर ही ये बातें सम्पाट और उनकी सभा को बता रहा है। आगे सोचविचार कर निर्णय लेना आपके हाथ में है।"


श्रीकृष्ण इतना कह कर मौन हो गये। पूरी सभा में बहुत देर तक सन्नाटा छाया रहा।


कुछ देर के बाद परशुराम ने धृतराष्ट्र को सम्बोधित करके प्राचीन काल के अहंकारी राजा दम्बोद्भव का प्रसंग सुनायाः


दम्बोद्भव प्रतिदिन अपनी प्रजासे अपनी वीरता की डींग हॉकता और पूछता- 'मुझसे श्रेष्ठ योद्धा इस पृथ्वी पर कौन है?


ऋषि-मुनि उसे समझाते कि इतना अति आत्म-विश्वास घातक होता है। लेकिन उसे ज्ञान नहीं हुआ। अन्त में ऋषियों ने बता दिया कि गन्धमादन पर्वत पर रहनेवाले दो तपस्वी बडे भारी योद्धा हैं।


दम्बोद्भव अपनी सारी सेना लेकर गन्दमादन पर्वत पर पहुंच गया। दोनों तपस्वियों ने उसका स्वागत किया और आतिथ्य ग्रहण करने की प्रार्थना की। 


पर दम्बोद्भव ने दंभ के साथ उतर दिया- 'युद्ध ही हमारे लिए आतिथ्य है।' तपस्वियों ने फिर उसे समझाया कि यह प्रदेश तपोभूमि है और युद्ध के लिए उपयुक्त नहीं है। दम्बोद्भव तब भी उन्हें युद्ध के लिए, ललकारता रहा।


तब एक तपस्वी ने कुश का एक तिनका दम्बोद्भव की सेना पर फेंक दिया। उसकी सेना सो गयी और दम्बोद्भव शिथिल हो गया। उसका दम्भ जाता रहा और वह तपस्वी के चरणों में गिर कर माफी मांगने लगा।


'अपने प्रलापों को त्याग कर प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करो, तभी उत्तम राजा बन सकते हो।' इतना कह कर तपस्वी ने आँखें बन्द कर ली और फिर तपस्या में लीन हो गये।


वे दोनों तपस्वी नर और नारायण थे। जिसने कुश का तिनका सेना पर फेंका था, वे नर थे और दूसरे नारायण थे। वे ही नर-नारायण अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। अर्जुन गांडीव उठाये, उसके पहले ही अपना दंभ छोड़ कर उसकी शरण में चले जाओ। इसी में तुम्हारा और तुम्हारे वंश का कल्याण है। इतना कह कर परशुराम चुप हो गये।


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..... Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty .....


Team: The Hindi Story
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