द्रोण के जन्म की कथा | Drona Ke Janm Ki Kahani Mahabharat


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Drona Ke Janm Ki Kahani Mahabharat
द्रोण के जन्म की कहानी महाभारत 

द्रोण के जन्म की भी बड़ी विचित्र कहानी है। एक बार महर्षि भारद्वाज जी अपने अनेक मुनि मित्रों को साथ ले गंगा स्नान को गये तो वहीं पर उन्होंने एक अप्सरा को गंगा में स्नान करके निकलते देखा।

बस फिर क्या था-महर्षि भारद्वाज जी का चंचल मन नग्न रूपवती को देखते ही मचल उठा। उसके गीले वस्त्र उसके सुन्दर शरीर पर ऐसे चिपक गये थे...जैसे उसने कोई वस्त्र ही न पहना हुआ हो।


भारद्वाज जी अपनी काम वासना की आग पर काबू न पा सके। उनका शरीर अन्दर ही अन्दर जलने लगा। वहीं पर उनके शरीर से वीर्य निकलकर द्रोण नामक यज्ञ पात्र में गिरा।


बस वहीं से द्रोण नामक बालक का जन्म हुआ, जो आगे चल कर द्रोणाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुये। द्रोणाचार्य, बचपन से ही प्रभु भक्त थे। छोटी आयु में ही उन्होंने भगवान की तपस्या आरम्भ कर दी। वे अपने आश्रम में रहने लगे। उनकी शादी शरद्वान की पुत्री कृपी से हुई...जिसके पेट से अश्वत्थामा नाम के एक पुत्र ने जन्म लिया।


एक बार जन्मदिग्न पुत्र परशुराम ने अपना सब कुछ ब्राह्मणों को दान कर दिया। उनके पास उनका शरीर और दिव्यअस्त्रों के सिवा और कुछ नहीं बचा था।


यह सुनते ही द्रोणाचार्य महेन्द्रांचल पर्वत पर पहुंच गये। यहां पर परशुराम रहते थे। परशुराम जी ने एक ब्राह्मण को अपने पास आते देखकर पूछा

"कहो ब्राह्मण युवक! मेरे पास क्या करने आये हो ?" 

“आपसे शस्त्र लेने-ब्राह्मण हूं, भिक्षा लेने आया हूं।"

"ठीक है, तुम सब ले जाओ।" 

परशुराम ने अपने सारे शस्त्र द्रोणाचार्य को दे दिये, साथ ही शस्त्र विद्या का ज्ञान भी। परशुराम ने अपना सब कुछ दान में देकर सन्यास ले लिया था।


द्रोणाचार्य महान शस्त्र विद्याधारी बनकर वहां से पांचाल देश के राजा द्रुपद के यहां पहुचे। वे दोनों पुराने मित्र थे। इन्होंने शस्त्र विद्या पहले एक ही गुरु से प्राप्त की थी।


छात्र जीवन में राजा द्रुपद ने कहा था कि जब मैं पांचाल देश का राजा बन जाऊंगा तो अपने राज्य का आधा भाग तुम्हें दे दूंगा।


द्रोणाचार्य गरीब ब्राह्मण थे। वे यही आशा लेकर द्रुपद के पास पहुंचे थे कि उसे अपनी प्रतिज्ञा याद दिला दूं। यदि वे अपने राज्य का आधा भाग नहीं भी देंगे तो कम से कम इतना धन तो दे देंगे जिससे वह अपने घर का गुजारा चला लेंगे।


किन्तु जैसे ही द्रोणाचार्य राजा द्रुपद के दरबार में पहुंचे और उसे उसकी मित्रता और प्रतिज्ञा याद दिलाई तो राजा द्रुपद ने साफ कह दिया-

“अरे ओ कंगाल ब्राह्मण" कभी तूने यह सुना भी है कि किसी कंगले का कोई राजा मित्र हो? जाओ तुम अपने जैसे लोगों में रहो।"


द्रोणाचार्य क्रोध से भरे अपने मन में प्रतिशोध की आग लिये हस्तिनापुर आ गये। वहीं जंगल में उनकी भेंट भीष्म जी से हुई। उन्होंने बुद्धिमान और महाज्ञानी पडित को झट से पहचान लिया कि यह द्रोणाचार्य है, बस उन्होंने अपने वंश के सभी युवकों को गुरु द्रोणाचार्य जी से शस्त्र विद्या प्राप्त करने के लिये वहां भेज दिया।


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..... Drona Ke Janm Ki Kahani Mahabharat .....


Team: The Hindi Story
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