Dushala Ka Janm Mahabharat | कृपाचार्य द्रोणाचार्य की जीवन कथा

दुःशाला का जन्म | Dushala Ka Janm

mythology-kahani-mahabharat-hindi-kahani-Dushala-Ka-Janm-kripacharya-aur-dronacharya-ki-jivan-katha-story
Dushala Kripacharya Aur Dronacharya Ki Katha Kahani

गान्धारी सौ पुत्रों की मां बन गई तो उसके मन में एक कन्या की और लालसा पैदा हुई। बस इसी इच्छा को लेकर उसने तपस्या आरम्भ की।

व्यास जी की कृपा से उनके घर में दुःशाला नाम की कन्या ने जन्म लिया। 

एक बार राज पांडू मुनि का शाप भूलकर अपनी पत्नी माद्री के साथ सम्भोग करने लगे तो उसी समय उन दोनों की मृत्यु हो गई।

कुन्ती अपने पांचों पुत्रों को लेकर वापस हस्तिनापुर आ गई। बेचारी कुन्ती जवानी में ही विधवा हो गई। पति का दुःख उसके ऊपर पहाड़ बनकर टूट पड़ा था। अब बेचारी का जीवन सूना हो गया था।

हस्तिनापुर में पांडव पुत्रों ने कौरवों के साथ खेलना आरम्भ कर दिया। पांडव हर कार्य में कौरवों से आगे रहते थे। हर खेल में कौरवों की हार होती और पांडवों की जीत। इनकी जीत का श्रेय वीर भीमसेन को ही जाता था।


भीम की यह बहादुरी देखकर दुर्योधन अन्दर ही अन्दर जलने लगा था। अब उसे भीमसेन अपना सबसे बड़ा शत्रु नजर आने लगा था। वह मन ही मन में यह सोचने लगा कि इस शत्रु को रास्ते से कैसे हटाया जाए?


एक दिन दुर्योधन ने भीमसेन के खाने में जहर मिला दिया, जिसके कारण भीमसेन बेहोश होकर नदी के किनारे गिर गये। तभी दुर्योधन ने भीमसेन को टांग से घसीट कर नदी में फेंक दिया।


भीमसेन सीधे पाताल लोक पहुंच गये। वहां पर सांपों ने उनके शरीर का सारा जहर चूस लिया। इसके बाद वे पहले से भी अधिक शक्ति प्राप्त कर पृथ्वी पर वापस आ गये। आते समय नागराज ने उसे अपना आशीर्वाद दिया और कहा कि संकट के समय हमें अवश्य याद करना मित्र। फिर सब भाई मिलकर कृपाचार्य के पास शिक्षा प्राप्त करने लगे।

====✥✥✥


कृपाचार्य और द्रोणाचार्य की जीवन कथा

महर्षि गौतम के पुत्र शरद्वान, जो बाणों के साथ ही पैदा हुए थे, उन्होंने तपस्या की शक्ति से ही सारे शस्त्रों को चलाना सीखा।


शरद्वान की तपस्या के डर से राजा इन्द्र ने अपनी गद्दी खतरे में देखकर अपने अखाड़े की एक सुन्दर अप्सरा को उसकी तपस्या भंग करने के लिये भेजा।


अप्सरा ने अपनी सुन्दरता का जादू चलाकर शरद्वान को वहां से भागने पर मजबूर कर दिया। भागते-भागते उसके शरीर का एक अंग सरकन्डों से कट गया। जिस कारण शरद्वान का खून वहां गिरा।


 शरद्वान तपस्वी के खून से एक कन्या तथा एक पुत्र पैदा हुये। अचानक ही राजा शान्तनु शिकार खेलते हुये उस ओर आ निकले।  उनके किसी सेवक की नजर उन तेजस्वी बच्चों पर जा पड़ी। उसने राजा को सूचना दी।


शान्तनु जी उन्हें उठाकर अपने महल में ले आये....उन्होंने लड़के का नाम कृपा और लड़की का कृपी रखा। इन दोनों बच्चों की शिक्षा भी बड़े-बड़े महर्षियों के पास ही हुई थी, जिसके कारण वे दोनों अत्यन्त ज्ञानी हुये।


✍✍✍✍✍

.....

..... KripaCharya Aur Dronacharya ki Jivan Katha Mahabharat  .....


Team: The Hindi Story
Previous Post
Next Post
Related Posts