1857 की वीर गाथा | प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम | Rani Laxmi Bai Ki Kahani

 

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Rani Laxmi Bai ki 1857 ki Veer Gatha Ki Kahani | Pratham Swatantrata Sangaram

Rani Laxmi Bai Ki Kahani | Pratham Swatantrata Sangaram | 1857 ki Veer Gatha
१८५७.की वीर गाथा | प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम | रानी लक्ष्मी बाई की कहानी 

 पूरे देश में यत्र-तत्र क्रान्ति की आग धधक रही थीं। क्रान्ति के दो महान युवा नायक थे-झाँसी की रानी और नाना साहेब ब्रिटिस सरकार ने राजा की मृत्यु के बाद बिना कारण झाँसी का राज्य हड़प लेने का प्रयास किया था किन्तु रानी ने ऐसा होने नहीं दिया। उसने बहादुरी के साथ आक्रमणकारी ब्रिटिश सेना का सामना किया। किन्तु जब किले को बचाना संभव न रहा तो वह अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांध, पुरुष वेश में घोड़े पर सवार हो, अंग्रेजों की सेना से बचती हुई, किले के मुख्य द्वार से बाहर निकल गई।


रानी अपनी दो विश्वासपात्र परिचारिकाओं मन्दर और काशी के साथ आगे बढ़ती गई। छोटी परन्तु बहादुर सेना की एक टुकड़ी उनका पीछा कर रही थी। रानी को बार-बार पीछे मुड़कर पीछा करनेवालों का सामना करना पड़ता था।


वह निरन्तर, पूरे दिन, विश्राम किये बिना घोडे पर सवार आगे बढ़ती रहीं। उनका पहला गन्तव्य कालपी था। झाँसी से पिछली रात चल कर कहीं आधी रात को कालपी पहुंची।


नाना साहेब के चचेरे भाई और सच्चे देशभक्त रावसाहेब के महल के सामने मशाल लेकर सन्तरी पहरा दे रहे थे।


"रानी! झाँसी की रानी यहाँ!" सन्तरी आपस में फुसफुसा रहे थे।


राव सादेव ने बाहर आकर रानी का स्वागत किया। जैसे ही रानी घोड़े से उतरी, महल की स्त्रियों ने उनके सोते हुए पुत्र को संभाला। पुरुषों ने उनके घोड़े की लगाम ले ली।


आह लगता है घोडे ने पूरी निष्ठा से अपने स्वामी के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर दिया था। वह अचानक वहीं धम्म से गिर पड़ा और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण-पखेरू उड़ गये।


रानी ने घुटनों के बल बैठ उसे प्यार से थपथपाया। उनकी आँखों से आंसू टपक पड़े, मानो वे अपने मूक सेवक के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हों।


परन्तु रानी के पास विश्राम के लिए समय कहाँ था? सुबह होते ही वह राव साहेब के साथ रणनीति निश्चय करने के लिए बैठ गईं। रानी के गुप्तचरों ने समय से पूर्व यह सूचना दी कि झाँसी में सारा दिन लूट-मार और कल्लेआम करने के बाद भारत में ब्रिटिश राज के कर्णधार सर ह्यूग रोज के नेतृत्व में आधी सेना इसी ओर बढ़ी आ रही है।


रानी, राव साहेब तथा एक अन्य महान क्रान्ति नायक तात्या टोपे ने उस क्षेत्र के तीन-चार राजाओं-सामन्तों के सैनिकों को, जो इनकी सेवा में तैनात थे, एकत्र किया तात्या टोपे के नेतृत्व में ये सैनिक इसी ओर आती हुई अंग्रेजी सेना की दिशा में बढ़ने लगी कुंद गाँव में दोनों सेनाएं टकरा गई।


दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ दुर्भाग्यवश तात्या टोपे को अपने सैनिकों को एक अनुशासन में संगठित करने का पर्याप्त समय नहीं मिला था। इसलिए कुछ घण्टों के युद्ध के पश्चात इन्हें पीछे लौटना पड़ा। अंग्रेजी सेना ने कालपी में प्रवेश कर नगर को खूब लूटा। अपने कारखाने में बनी हुई बन्दूकों तथा बारूद के विशाल भण्डार से भरा राव साहब का शस्त्रागार सर ह्यूग रोज के लिए एक बड़ा तोहफा साबित हुआ।


अंग्रेजों ने इस विजय पर खूब खुशियां मनाई। किन्तु, रानी लक्ष्मीबाई, राव साहेब तथा तात्या टोपे में से किसी को भी बन्दी बनाने में विफल हो जाने के कारण वे निराश हो गये। ये तीनों नेता अपनी सेना का पुनर्गठन कर ग्वालियर पहुंच गये। ग्वालियर के राजा सिंधिया अंग्रेजों के समर्थक थे। लेकिन कुलीन और जन साधारण वर्ग के मन में क्रान्तिकारियों के लिए आदर-भाव था।


जैसे ही क्रान्तिकारी म्वालियर पहुँचे, राजा सिंधिया शहर छोड़कर भाग गया। रानी तथा इनके सहयोगियों का भव्य स्वागत किया गया। ट्यूग रोज ने इसे अपना घोर अपमान समझा। वह जानता था कि यदि सिंधिया को ग्वालियर वापस नहीं मिला तो अन्य राजा ईस्ट इण्डिया कम्पनी की, उनकी रक्षा करने की, शक्ति में विश्वास खो देंगे। भाग्य से झाँसी अब पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण में था। अंग्रेजी सेना का वहाँ रहना आवश्यक नहीं था। ह्यूग रोज़ ने वहाँ से सैनिकों को बुला लिया और एक बड़ी सेना संगठित कर ग्वालियर चल पड़ा। उसने सिंधिया को अपनी सेना का अगुआ बना दिया। यह चाल उसके लिए वरदान सिद्ध हुई। 


ग्वालियर की प्रजा ने क्रान्तिकारियों का स्वागत-सम्मान किया था। वे चाहते थे कि अंग्रेज हमारा देश छोड़ कर वापस चले जाएं। फिर भी अपने परंपरागत शासक के प्रति उनमें स्वाभाविक सहानुभूति थी। जब उन्होंने देखा कि अंग्रेजों से लड़ने का अर्थ है अपने राजा से लड़ना, तो वे निष्पक्ष हो गये। 


रानी ने बहुत बहादुरी और दृढ निश्चय के साथ अंग्रेजी सेना से मुकाबला किया। वह युद्ध में सदा अपनी सेना के आगे रहा करती थीं। दुर्भाग्यवश उनका विश्वासी घीड़ा पहले ही मर चुका था। जिस नये घोड़े पर वह सवार थीं, वह इनके युद्धाभ्यास की गतियों और युक्तियों से परिचित नहीं था, जबकि शत्रु बेरहम था। सर ह्यूग रोज एक कुशल और अनुभवी सेनापति था। अंग्रेज कप्तान इसके अधीन कई युद्ध लड़ चुके थे। फिर भी, रानी ने, जो सिर्फ २० वर्ष की थीं, उन्हें काफी समय तक घमासान युद्ध में उलझाये रखा। 


इनकी एक मात्र पूंजी जी थी-अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति। इनके सैनिक समर्पित अवश्य थे किन्तु अधिकांश प्रशिक्षित नहीं थे। इसलिए वे पेशेवर अंग्रेजी सैनिकों के चालबाजी भरे आक्रमण का सामना नहीं कर सके। यदि ग्वालियर इनका साथ देता तो स्थिति भिन्न हो जाती।


दोपहर के काफी बाद रानी के सेनाधिकारियों ने वापस लौट जाने की सलाह देते हुए कहा,"इस समय युद्ध में प्राण देने का औचित्य नहीं है। यदि आप जीवित रहीं तो आप के झण्डे के नीचे हमलोग फिर से संगठित हो सकते हैं।"


रानी उनके सुझाव का आदर करती हुई मन्दर, काशी और मुट्ठी भर सैनिकों के साथ युद्ध क्षेत्र छोड़ कर पीछे लौट पड़ीं। वह घोड़े पर सवार बहुत तेज रफ्तार में जा रही थीं। शत्रु सेना भूखे भेड़िये की तरह उनका पीछा कर रही थी। उन्हें मालूम था कि यदि रानी को जीवित या मृत पकड़ लिया तो मालिकों से उन्हें जिन्दगी का सबसे बड़ा इनाम दिया जायेगा।


रानी ने एक चौरास्ते पर आकर एक तंग गली में घोड़े को मोड़ दिया। पीछा करनेवालों को पता न चला कि वह किस दिशा में गई है। इसलिए वे टुकड़ियों में बँट कर चारों ओर फैल गये। रानी के अंगरक्षक अचानक रुक गये और पीछा करने वाले अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया।


रानी कुछ दूरी तर सुरक्षित भागती रहीं। शत्रु की दूसरी टुकड़ी के सिपाही उनका पीछा करते देखे गये। मार्ग में एक तंग नदी आ गई। रानी अपने पुराने घोड़े पर इससे अधिक चौड़े नाले को छलांग लगा कर पार कर जाती थीं। किन्तु नया घोड़ा उतना योग्य नहीं था। वह रुक गया और घबरा कर नदी के किनारे दुलकी चलने लगा।


तभी शत्रु के सिपाही निकट आ गये और रानी के सैनिकों पर टूट पड़े। मन्दर घायल हो गई। रानी नदी किनारे एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच गई थीं जहाँ पानी छिछला था और उसे आसानी से पार कर सकती थीं। लेकिन मन्दर की चीख ने उन्हें वापस लौटने पर बाध्य कर दिया। उन्होंने तलवार के एक ही बार में उसके आक्रमणकारी का काम तमाम कर दिया। फिर घोडे से उतर कर घायल मन्दर को संभाला। तभी एक कायर ने उनके सिर पर तलवार चला दी। रानी के अंगरक्षकों ने तुरन्त उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। फिर रक्त से लथपथ रानी को एक निकटवर्ती कुटिया में ले आये।


"मेरे बहादुरों!" मरणासन्न रानी धीमी आवाज में बोली, "मेरे प्राण निकलते ही मेरा दाह-संस्कार कर देना। शत्रु आने ही वाले हैं। मैं चाहती हूँ कि मेरे शरीर को स्पर्श कर वे इसे अपवित्र न करें।"


सचमुच अगले ही क्षण उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। उनके विश्वासी सेवकों ने सूखी पत्तियाँ और लकड़ियाँ एकत्र कर उनका अन्तिम संस्कार कर दिया।


इस प्रकार भारतीय इतिहास का एक चमकता सितारा सदा के लिए अस्त हो गया। इतिहास में इनके समकक्ष एक मात्र व्यक्तित्व था-जोन ऑफ आर्क।


जवाहर लाल कहते हैं-"एक नाम दूसरों से अलग थलग लोक-स्मृति में जो आज भी ताजा है, वह है झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, बीस वर्ष की एक बाला जो देश के लिए लड़ते-लड़ते जान पर खेल गई। विरोधी अंग्रेज सेनापति ने जिसके लिए कहा था,-"सर्वोत्तम और श्रेष्ठतम वीरांगना।"


यह क्रान्ति शीघ्र ही समाप्त हो गई, क्योंकि क्रान्ति के नायक एक-एक कर या तो बहादुरी से युद्ध करते हुए मारे गये या फाँसी के तख्ते पर झूल गये।


शूरवीरता, साहस, दूरदर्शिता और नेतृत्व-भारत में इन गुणों का कभी अभाव नहीं रहा। जिस गुण का यहाँ अभाव था, वह था-तात्कालिक राजाओं में एकता। उनमें एक दूसरे को नीचा दिखाने की एक जबरदस्त होड़ थी। उनमें कुछेक तो अपने ही देश के दुश्मनों और प्रतिद्वन्द्वी राजाओं से लड़ने के लिए विदेशी शक्तियों से भी मदद लेने में शर्म नहीं करते थे। इसके अतिरिक्त, अंग्रेजी सेना अधिक श्रेष्ठ थी और उसमें पेशेवर सैनिक थे, जबकि भारतीय सेना में स्वाधीनता के भाव से प्रेरित सामान्य जन थे जो युद्ध कौशल में प्रशिक्षित नहीं थे।


क्रान्ति समाप्त होते ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कप्तानों और सैनिकों ने भारतीयों पर निर्मम अत्याचार किया हजारों निर्दोष व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया गया और सैकड़ों गाँव जला कर राख कर दिये गये। महलों और किलाओं को बर्बरता से लूटा गया। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को, जिन्होंने क्रान्तिकारियों को समर्थन दिया था, बन्दी बना कर रंगून निर्वासित कर दिया गया, जहाँ वृद्धावस्था और मायूसी में उन्होंने दम तोड़ दिया।


जो भी हो, ब्रिटेन की जनता और नेताओं ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की, इसके अनाचारों, नीचताओं और दुर्व्यवस्थाओं के लिए, खूब खबर ली। भारतीय प्रशासन की जाँच कराई गई। महारानी विक्टोरिया ने राजक्षमा की घोषणा की और भारतीय राजाओं के तात्कालिक अधिकारों को स्वीकार कर लिया।


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..... Rani Laxmi Bai Ki 1857 Ke Yudh ki Kahani .....


Team: The Hindi Story
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