Mahabharat Ki Hindi Kahani: राजा शान्तनु और गंगा महाभारत कहानी

Mahabharat Ki Hindi Kahani: Raja Shantanu Aur Ganga Ji
महाभारत की हिंदी कहानी:  महाराजा शान्तनु और गंगा जी

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Raja Shantanu Aur Ganga Ji Ki Hindi Kahani Mahabharat


 महाराजा शान्तनु और भीष्म पितामह 

राजा शान्तनु!

अपने समय के महावीर योद्धा और अपनी सत्यवादिता, दानशीलता और तपस्या शक्ति के कारण देवताओं के महाधिपति इन्द्र के तुल्य तेजस्वी एवं यशस्वी थे।


इनका राज्य अति विशाल था-प्रजा बहुत सुखी थी और अपने राजा को भगवान समझकर पूजती थी।


एक बार...!


महाराजा शान्तनु जंगल में शिकार खेलने गये तो किसी मृग का पीछा करते-करते दूर गंगा के तट पर निकल गये। गंगा का पवित्र और शुद्ध जल, ठण्डी-ठण्डी हवायें, चारों ओर खिले हुये फूल।


आहा...कितना आनन्द है इस स्थान पर! कितनी शान्ति है! चारों ओर से फूलों की महक आ रही है। कुछ देर के लिये राजा शान्तनु गंगा किनारे उस हरी-हरी घास पर बैठकर आनन्द लेने लगे। उनका मन मस्ती में नाच रहा था।


थोड़ी देर में इन फूलों में से राजा शान्तनु ने एक सुन्दरी को निकलते देखा। बस उस महान सुन्दरी को देखते ही राजा शान्तनु देखते ही रह गये। उनके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। आंखें उसके गोरे शरीर से अलग न हो सकीं।


ऐसी सुन्दरी तो उन्होंने पहली बार देखी थी-उसके शरीर का हर अंग एक नशा था। शान्तनु देखते ही रह गये-ऐसा प्रतीत होता था कि वह पत्थर के बन गये हो। “सुन्दरी ! तुम देव, दानव, यक्ष आदि में से किसकी कन्या हो?" 


"हा-हा-हा।" वह सुन्दरी राजा की ओर देखकर जोर-जोर से हंसने लगी-जैसे उसने कोई अनहोनी बात कह दी हो।


इस हंसी के साथ ही उसके शरीर का अंग-अंग हिलने लगा था-उसके हर अंग में से एक नशा टपक रहा था-मस्ती में झूमती हुई वह नाचने लगी थी।


"तुम मेरी बात का उत्तर नहीं दोगी, रूप सुन्दरी?" राजा उसके निकट चले गये।


"क्या चाहते हो तुम?" सुन्दरी के होठों से यह शब्द निकले तो राजा शान्तनु ने महसूस किया जैसे हजारों फूल टूटकर उनकी झोली में आ गिरे हों। ,


"मैं यदि तुम्हें अपनी पत्नी बना लूं तो...?" 

"तो क्या होगा महाराज?" 

वह सुन्दरी भी राजा शान्तनु के सुन्दर और बहादुर शरीर को देखकर मोहित हो गई थी-किन्तु फिर भी उसने अपने आप पर काबू पा ही लिया-जैसे राजा के जवाब की प्रतीक्षा कर रही हो।


"रूपवती" 

"हां महाराज!" 

"तुम बहुत सुन्दर हो और मुझे बहुत प्यारी लगती हो।" 

"फिर-?"


सुन्दरी ने राजा शान्तनु की आँखों में आँखे डालते हुए बड़े अन्दाज से उनकी ओर देखा। वह तो अपना दिल इस युवक को दे ही बैठी थी-किन्तु फिर भी अपने मन की बात राजा के मुंह से सुनना चाहती थी। 

उसे पता था राजा उस पर मोहित हो चुका है 

"मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं देवरानी! तुम्हारी सुन्दरता, तुम्हारा प्यार यदि मुझे मिल जाये तो मेरा जीवन सफल हो जाये।"


“राजनः मैं आपकी व्याकुलता को भली-भांति समझ रही हूं। तुम्हारी आंखों में जो स्नेह है-उसे मैं भूल नहीं सकती, किन्तु यदि आप मुझसे शादी करना चाहते हैं तो आपको मेरी कुछ शर्तों को मानना अनिवार्य होगा।"


“सुन्दरी, मैं राजा शान्तनु हूं...मैं तुम्हारी हर शर्त मानने को तैयार हूं...बस एक बार इन प्यार भरे होठों से मुझे यह कह दो कि मैं तुम्हारा हाथ सदा के लिये अपने हाथों में ले लूंगी।"


"राजन, मैं आपकी हो सकती हूं...मैं आपके प्यार को प्यार दे सकती हूं... किन्तु आपको भी मेरी इन शर्तों का पालन करना होगा।

(1) आप मुझसे कभी भी यह नहीं पूछोगे कि मैं कौन हूं और कहां से आई हूं...और न ही मैं आपको यह बताऊंगी।"

(2) मैं जो भी करूंगी, आप मुझे कभी रोकेंगे नहीं। मैं जहां भी ज़ाऊंगी, आप मुझसे यह नहीं पूछोगे कि मैं क्या करने जा रही हूं।

(3) आप कभी भी मुझे अप्रिय शब्द नहीं बोलेंगे।


"बस आप जब तक अपनी प्रतिज्ञा का पालन करोगे, तब तक मैं आपके साथ रहूंगी। हां, जिस दिन आप अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ दोगे, बस उसी दिन आपको छोड़कर चली जाऊंगी।"


राजा शान्तनु तो उस सुन्दरी को देखकर ही अपना सब कुछ भूल चुके थे। उनका हृदय घायल पंछी की भांति तड़प रहा था, उन्हें तो केवल यह सुन्दरी चाहिये थी। इसके लिये वे कुछ भी कुर्बान करने के लिए तैयार थे-यह शर्ते तो कोई विशेष थी ही नहीं।


उसी समय उन्होंने हंसते हुए कहा- “देखो सुन्दरी...हम अभी तुम्हें वचन देते हैं कि हम तुम्हारी इन सब शर्तों का पालन करने की प्रतिज्ञा करते हैं।"

बस-! 

उसी दिन से गंगाजी राजा शान्तनु के साथ विवाह करके उनके महलों में रहने लगीं। शान्तनु से उन्हें हार्दिक प्यार था- यह प्यार तो उस पुनर्जन्म की कहानी थी, जो शाप बन गया था।

इस कहानी को शायद शान्तनु न जानते हो किन्तु गंगाजी को तो वह दिन याद था। 


अतीत का वह दिन-!

अब महाभिषेक नामक प्रतापी राजा ने हजार अश्वमेघ यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया था।

वे देवराज इन्द्र की सभा में सब देवताओं के साथ बैठे हुये थे। उसी समय तो वह हवा के झोंके के समान उस सभा में पहुंच गई। सब देवताओं ने उठकर हाथ जोड़ते हुए कहा था

"गंगा मां की जय हो।

गंगा मां की जय हो।" 


सब लोग उसकी जय-जयकार करते हुए सिर झुकाये बैठे थे, किन्तु राजा महाभिषेक उसकी ओर प्यार भरी नजरों से देखते रहे।

उनकी नजरों से कामदेव टपक रहा था-उसकी सुन्दरता पर राजा महाभिषेक मर मिटे थे


ब्रह्मा जी ने राजा महाभिषेक को यह पाप करते देखकर शाप दिया था कि “जाओ तुम मृतलोक में जाकर जन्म लो और स्वर्ग को छोड़ कुछ दिन वहीं पर रहो।"


पृथ्वी पर आकर धर्मात्मा व तेजस्वी राजा प्रतीक के घर महाभिषेक ने जन्म लिया। गंगा स्वयं भी तो महाभिषेक पर मोहित हो चुकी थी-तभी तो वह ब्रह्मलोक छोड़कर पृथ्वीलोक में आ गई थी।


जब वह पृथ्वी लोक में आ रही थी तो रास्ते में उन्होंने आठ ‘वतुओं को पृथ्वी की ओर आते देखा।


स्वर्ग लोग से पृथ्वी की ओर आते देखकर उनके आने का कारण जब उन्होंने पूछा ! तो वे आठों उदास स्वर में बोले


“हे मां गंगे...हम लोग महर्षि दुर्वसा जी को पहचान न सके, उनको नमस्कार न करने और आदर न करने पर उन्होंने हमें यह शाप दे दिया कि-जाओ, तुम स्वर्ग से निकलकर पृथ्वी पर मानव जन्म लो।"


"मां गंगे! अब हम उस स्त्री की खोज कर रहे हैं जो हमें अपने पेट से जन्म देकर हमें वापस स्वर्ग भेज दे...हमें पता है, पृथ्वी पर हमारे पिता शान्तनु होंगे और माता...।"


"हे, मां गंगे, अब आप हमारी मां बनो और हमें जन्म देते ही मार डालना ताकि हम वापस देवलोक पहुंच जायें।"


“ठीक है देवताओं, मैं ही तुम्हारा कल्याण करूंगी-मैं तुम्हें अपने पेट से जन्म देकर वापस देवलोक भेज दूंगी।" 

और...। अब वही प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये उसने यह रूप धारण किया।


शान्तनु नहीं जानते थे कि जिससे मैंने शादी की है-वह तो वही है, जिसके लिए उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया गया था।


उनकी भी हार्दिक इच्छा पूरी हो गई थी और साथ ही उन देवगणों का भी कल्याण हो जायेगा। यही सब सोच गंगाजी शांतनु के महलों में रानी बनकर रहने लगीं। 

महाराजा शान्तनु का राज्य बहुत बड़ा था-उनकी राजधानी हस्तिनापुर थी। 

गंगाजी ने एक-एक करके सात पुत्रों को जन्म दिया। वह जैसे ही एक पुत्र को जन्म देती-वैसे ही उसे उठाकर गंगाजी में डाल आती। उस बेचारे की मृत्यु जन्म लेते ही हो जाती। 

राजा शान्तनु अपनी सन्तान को इस तरह बेदर्दी से मरते देख कर तड़प उठते। उनका मन खून के आंसू बहाने लगता। वह तो एक बाप था-जो अपनी सन्तान के लिए इस प्रकार से तड़प रहा था।


उन्हें बार-बार यह ख्याल आता कि उसकी पत्नी तो एक माँ है, जिसके सीने में ममता तड़पती है। उसे अपनी सन्तान का गला घोंटते हुए दुःख नहीं होता? वह क्यों नहीं रोती-वह कैसी माँ है?

सात.बेटों की हत्या करने वाली नारी ने न तो कभी आंसू बहाए और न ही अपने किए पर पश्चाताप किया- वह तो उसी प्रकार हंसी-खुशी से महलों में रहती थी।

वह ऐसा महापाप क्यों करती थी?


राजा उससे इसलिये नहीं पूछ सकता था...क्योंकि उसने शादी से पूर्व यह वचन दे रखा था कि मैं तुमसे किसी चीज के बारे में न तो पुछुगा और न ही रोकूंगा।


किन्तु...! हर चीज की एक सीमा होती है। मानव के हृदय में जितनी सहन शक्ति होगी- वह उतना ही सहन कर पायेगा। राजा शान्तनु ने अपने सात बेटों की हत्या होते देखी-यह दुःख अन्दर ही अन्दर उन्होंने पी लिया।

परन्तु जैसे ही आठवें बच्चे का जन्म हुआ-राजा ने अपने फूल से बेटे और हृदय के टुकड़े, देश के होने वाले राजकुमार को देखा। उसका चेहरा फूल की भाति खिला हुआ था।


"मेरा बेटा...मेरे जिगर का टुकड़ा कितना सुन्दर है...शक्ल से ही यह महाबली लगता है।" शान्तनु अपने बेटे का मुंह चूमने लगे...किन्तु साथ ही उन्हें ध्यान आया कि उनकी पत्नी इसे भी लेजाकर पानी में बहा आयेगी, इसकी भी मृत्यु हो जायेगी।


सारा शरीर पतझड़ के पत्ते की भाति कांप उठा था शान्तनु का।


उसने अपने बेटे को बड़े प्यार से देखा...फिर अपनी सुन्दर पत्नी को, जो विश्व सुन्दरी से कम नहीं थी-ऐसी सुन्दर नारी इस पृथ्वी पर नहीं थी। सुन्दर होते हुए यह पत्थर हृदय क्यों थी?


उसने उसकी आंखों के सामने ही सात बेटों की हत्या की, किन्तु वे उससे एक बार भी इसका कारण पूछने की हिम्मत न कर सके।


आज उनका आठवां बेटा भी मृत्युलोक में पहुंच जायेगा...उसकी भी हत्या कर दी जायेगी।


यदि वह अपनी पत्नी को रोकेंगे तो शर्त भंग होने का डर...और इसके साथ ही पत्नी के चले जाने की शर्त भी उन्हें याद थी।


गंगा ने अपने आठवें बेटे को भी गोद में उठाया और राजा के सामने ही उसे गंगा में बहाने चलने लगी।


इस बार राजा शान्तनु के धैर्य का बांध टूट गया। सात बच्चों की मृत्यु ने उन्हें तोड़कर रख दिया था-अब तो उनकी सहन-शक्ति समाप्त हो चुकी थी।


"कहां जा रही हो प्रिया?"

"राजन, क्या आपको यह भी याद नहीं कि मुझसे यह सब कुछ पूछने का अधिकार आप खो चुके हैं?"


"प्रिया...तुम मेरी पत्नी ही नहीं, एक माँ भी हो...क्या इस संसार की कोई माँ अपने बच्चों की हत्या अपने हाथों से कर सकती है? बहुत हो गया प्रिया-मैंने बहुत कष्ट सहन कर लिये-मेरे सात बेटे मेरी आंखों के सामने मारे गये-मैं सीने पर पत्थर रखकर सब सहन कर गया-क्योंकि मैंने तुम्हें वचन दे रखा था...किन्तु आज जो भी परिणाम निकले...जो भी कष्ट मुझे उठाने पड़ें, आज मैं शान्त नहीं रहूंगा...आज मेरे धैर्य का बांध टूट चुका है।


अब मुझमें यह शक्ति नहीं रही कि मैं इस फूल की मृत्यु अपनी आंखों के सामने देख सकूँ।"

“राजन!" 

"हां प्रिया!" 

"आपको मेरी शर्ते याद हैं न ?"

“मुझे सब कुछ याद है- पर कुछ भी याद नहीं...मुझे आज कुछ याद है तो यह अपना बेटा...बेटा तो यह तुम्हारा भी है...बाप से अधिक प्यार तो माँ के सीने में होता है...किन्तु न जाने तुम कैसी माँ हो! सच बताओ तुम कौन हो देवी? कहां से आई हो? क्या चाहती हो? क्यों अपनी ममता की हत्या कर रही हो?'


"हे राजन! तुमने आज अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी...तुम अपनी शर्त हार गये अब मैं आपके महल से अवश्य चली जाऊंगी। हमारा और आपका निर्वाह नहीं होगा...क्योंकि हम दोनों ने इस वचन का पालन करने की प्रतिज्ञा की हुई थी...अब मैं जा रही हूं तो राजन सुन लो...

मैं राजा जन्हू की कन्या गंगा हूं...मैं देवताओं के कार्य सिद्धि और उन्हें शाप से मुक्ति दिलाने के लिये आपकी पत्नी बनी-इन आठ देवताओं (वसुओं) को दुर्वासा जी ने शाप दिया था। इन सात वसुओं को तो मैं वापस देवलोक भेज चुकी हूं-आपका यह आठवां बेटा वसु ‘धू' है...जिसने दुर्वासा जी के गाय के बछड़े को चुरा लिया था...अब यह कुछ समय तक पृथ्वी पर ही रहेगा।


क्योंकि आपका वचन भंग हो चुका है- मैं इसे अब नदि में नहीं फेंकूगी। अब मैं आपसे विदा ले रही हूं और इस देवपुत्र धू को भी अपने साथ ले जा रही हूँ जिसे कि समय आने पर मैं आपको वापस कर दूंगी। हां, मैं वचन देती हूं कि यह बच्चा जीवित रहेगा।"


"गंगे...तुम...?"

राजा ने आश्चर्य से अपनी पत्नी की ओर देखा, जैसे उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही न आ रहा हो।

"हां महाराज...आपकी पत्नी गंगा ही थी...जिसे आप नहीं पहचान पाये...मुझे खुशी है कि आज आपकी कृपा से मैंने सात वसुओं का तो कल्याण कर दिया है अब रह गया यह आठवां...

"बस इसका भी कल्याण हो ही जायेगा।" यह कहकर मां गंगा वहां से हवा बनकर उड़ गई।

राजा शान्तनु खड़े-खड़े सब कुछ देखते रहे उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था...जैसे उन्होंने कोई सपना देखा हो।


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..... Mahabharat Ki Hindi Kahani: Raja Shantanu Aur Ganga Ji  .....


Team: The Hindi Story


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