Acchi Seekh Deti Hindi Kahani: व्यापार में दुनियादारी

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Acchi Seekh wali Hindi Kahani


Acchi Seekh Deti Hindi Kahani: Vyapar Mein Duniyadari
अच्छी सीख देती हिंदी कहानी: व्यापार में दुनियादारी

र्मकटक एक छोटा-सा राज्य था। धर्मराज उसका राजा था। वह प्रजा को निजी संतान मानता था। पड़ोसी राज्यों से भी उसके अच्छे संबंध थे। परंतु, उसकी एक कमज़ोरी थी। वह अपने मंत्रियों राजकर्मचारियों पर अति विश्वाश रखता था। इस वजह से कभी-कभी कष्टों का सामना करना पड़ता था। 


धर्मकटक राज्य में विवध हस्तकलाओं की अभिवृद्धि हुई। रत्न कम्बल और रेशम की महीन साडियां दूसरे राज्यों में बेची जाती थीं।

 

धर्मराज एक दिन अपनी रानी के साथ रथ में आसीन होकर नगर में घूमने निकला | नगरवासियों  ने राज दंपति का स्वागत किया। नगर की गलियों से जब वे गुज़र रहे थे, तब रत्नाचारी नामक एक व्यापारी की दुकान में सजाये गये रत्न कम्बलों और रेशम की साड़ियों ने रानी की दृष्टि को आकर्षित किया।

 

अंत:पुर लौटते ही रानी ने राजा से विनती की कि वे रत्नाचारी की दुकान से कुछ रत्नकम्बल

और साड़ियां मँगायें। राजा ने अपने महामंत्री को बुलवाया और रानी की इच्छा बतायी और कहा, “किसी को भेजकर उन्हें मंगाइये और उनकी क्रीमत भी चुकाने का प्रबंध कीजिये |”

 

प्रभु, फौरन ही इसका इंतज़ाम करता हूँ।'' फिर महामंत्री ने कोषाधिकारी को इसकी जिम्मेदारी सौंपी।

 

कोषाधिकारी ने फौरन यह काम वाणिज्य अधिकारी को सौंपा | वाणिज्य अधिकारी ने यह

काम कर वसूल करनेवाले अधिकारी को सौंपा |

 

सैनिक उस दुकान में गये और रत्नाचारी को इसका समाचार दिया | रत्नाचारी ने कहा, 'राजा अज्ञा दें तो यह दुकान ही उनके सुपुर्द कर दूँकहते हुए उसने पनच्चीस साड़ियों और पच्नीस रत्न कम्बल सैनिकों के सुपुर्द कर दिये | साथ ही उसने सैनिकों की पत्नियों के लिए भी दो-दो साडियाँ दीं।


तुमने हमारी पत्नियों के लिए भी दो-दो साड़ियों दीं। परंतु, हमारे उच्च अधिकारियों के

लिए क्या दोगे?”” सैनिकों ने पूछा।

 

लाचार रत्नाचारी ने वाणिज्य अधिकारी, कर अधिकारी की पत्नियों के लिए भी साड़ियाँ और

कम्बल दिये।

 

रत्नाचारी उस रात को सो नहीं पाया। एकएक कम्बल की क्रीमत कम से कम लाख अशर्फियाँ  थीं। कुछ दिनों तक वह रक़म पाने का इंतज़ार करता रहा | पर, कोई फ़ायदा नहीं हुआ। उसे लगा कि सैनिकों या अधिकारियों को बताने से कोई लाभ नहीं होगा। उसने अपने एक विश्वस्त नौकर के द्वारा कोषाधिकारी को उनके दामों का विवरण देते हुए एक प्रार्थना-पत्र भेजा।

 

कोषाधिकारी ने वह प्रार्थना-पत्र वाणिज्य अधिकारी को दिया | वाणिज्य अधिकारी ने कर अधिकारी को बुलाकर उसे खूब डॉटा। 

रत्नाचारी इस आशा में था कि दूसरे ही दिन उसकी रक़म उसे मिल जायेगी, पर ऐसा नहीं

हुआ। वह इसे अपना अपमान मानने लगा |


वाणिज्य अधिकारी के गुप्तचर दुकान में आये और पूरी दुकान की छान-बीन की | उन्होंने

फैसला सुनाया कि कर चुकाया नहीं गया। उन्होंने यह भी फैसला सुनाया कि उसके पास अपार संपत्ति है, जिसका हिसाब कोषाधिकारी को समर्पित किया नहीं गया। बस, उन्होंने रत्नाचारी को कैद कर लिया और जेल में ठुस दिया

रत्नाचारी की पत्नी और बच्चे इस घटना को लेकर परेशान हो उठे | उनकी समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए। वे अपने दुर्भाग्य पर, अपनी विवशता पर रोने-बिलखने लगे

ठीक उसी दिन शाम को, काशी की यात्रा पर गया हुआ रत्नाचारी का पिता माणिक्याचारी घर लौटा। विषय की जानकारी पाकर वह कोषाधिकारी के मामा से मिला, जो उसका बाल्य मित्र था। उसे लेकर वह कोषाधिकारी के पास गया और अपने बेटे की तरफ से क्षमा माँगी |

 

उसने कोषाधिकारी से बताया, ''मेरे पुत्र रत्नाचारी के पास जो अपार संपत्ति है, वह उसकी

कमाई नहीं है, बल्कि उसके पुरखों से प्राप्त संपत्ति है। मेरा बेटा बिना चूके कर अदा कर रहा है।'!

इसके समर्थन में उसने सबूत भी प्रस्तुत किये और आख़िर वह अपने बेटे को जेल से बाहर ले आने में सफल हुआ।

 

यह सब होने में एक महीना लग गया। उस समय रत्नाचारी का व्यापार बरबाद हो गया |

उसके साथ जो अन्याय हुआ, उसे लेकर रत्नाचारी बहुत दुखी हुआ | तंग आकर उसने

एक दिन पिता से कहा, हमारे साथ जो अन्याय हुआ है, उसकी शिकायत खुद राजा से करूँगा।

 

यह सुनते ही उसके पिता ने लंबी सांस खींचते हुए कहा, “तुम एक व्यापारी के पुत्र होइतने लंबे समय से व्यापार करते रहे हो, पर तुमने दुनियादारी नहीं सीखी | दुनियादारी के होने के कारण ही यह सब हुआ 

आसानी से हल हो सकने वाली समस्या को तुमने जटिल बना दिया | रानी को तुमने जो रत्नकम्बल और साडियाँ भेजी, उनकी क़ीमत को वसूल करने के लिए तुम्हें कोषाधिकारी को प्रार्थना-पत्र भेजना नहीं चाहिये था। धन भी गया, इजत भी खो दी ”'

 

लाख अशर्फियों की क्रीमत की चीज़ों को कैसे छोड़ दूं? हमें इतनी रक्रम कौन देगा? ” परेशान रत्नाचारी ने पूछा।

 

लाख नहीं, करोड़ों अशर्फियों कमा सकते थे। यह संभव होता, अगर राजा का थोड़ा-सा विश्वास पा लेते |” पिता ने कहा।

 तो क्या इसका यह मतलब है, कि हमें जो मिलना है, उसे मांगें? क्या वह अपराध है ?' रत्नाचारी ने क्रोध-भरे स्वर में पूछा |

 

मॉँगना अपराध नहीं माँगने की पद्धति में दुनियादारी नहीं निभाई | इसी वजह से हमारा धन नष्ट हुआहमारी इजत गयी, 'पिता ने कहा।


मेरी समझ में नहीं आता कि आप कहना क्या चाहते हैं।''बेचारे रत्नाचारी ने पूछा |

राजा अच्छे हैं, पर इसका यदह्द मतलब नहीं कि उनके परिवार के सब सदस्य अच्छे हें | व्यापार के गुरों को जानना है और दुनियादारी बरतनी है।

वास्तविकता एक तरफ है तो व्यापार दूसरी तरफ़दोनों में आकाश-पाताल का अंतर है। अब भी अनुभव में कच्चे हो ''पिता ने कहा।

 

ठीक है। बताइये कि मुझे उस समय क्या करना था? आप बात को घुमा-फिराकर कहने

के बदले मुझसे साफ़-साफ़ कहिये, ” रत्नाचारी ने दृढ स्वर में कहा।

 

तुमने शुरुआत में ही बहुत बडी ग़लती कीरानी के लिए जो कम्बल और साड़ियों दीं, उनके साथ तुमने सैनिकों को भी दिया | बड़े अधिकारियों के लिए भी भेजा | तुमने सोचा कि इससे वे खुश होंगे और तुम्हारी तरफदारी करेंगे। 

ऐसा करके तुम उन्हें लेकर रानी के पास सीधे चले जाते तो तुम्हें उनकी क़ीमत भी मिल जाती और तुम्हारा अच्छा नाम भी हो जाता। तुम प्रचार भी कर सकते थे कि रानी जो साडियाँ पहनती हैं, वे हमारी दुकान में उपलब्ध हैं। 

इससे हमारा व्यापार बढ़ जाता, अधिकाधिक कमा पाते। समझे मेरी बात?” पिता ने कहा |

 

हाँ, आपने बिलकुल ठीक कहा,” वहाँ उपस्थित रत्नाचारी की पत्नी ने ससुर की दलीलों

का समर्थन करते हुए कहापिता की दुनियादारी पर रत्नाचारी स्तम्भित रह गया।

 

इस घटना के दस दिनों के बाद, रत्नाचारी के पिता को कोषाधिकारी से बुलावा आया।

कोषाधिकारी ने कहा, 'तुम्हारे पुत्र रत्नाचारी के साथ जो अन्याय हुआ है, उसकी ख़बर मैंने

राजा को दी | उन्होंने आवश्यक तहकीकात कीदोषियों को सज़ा दी और आदेश दिया कि

रत्नाचारी को उसकी वास्तविक रकम से दुगुनी दी जाए।कहते हुए उसने दो लाख अशर्फियाँ उसे दीं।

 

इतनी भारी रक़म को देखकर रत्नाचारी और उसकी पत्नी बेहद खुश हुए।

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..... Acchi Seekh Deti Hindi Kahani: Vyapar Mein Duniyadari [ Ends Here ] .....


Team: The Hindi Story


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