Darpok Sher Ki Hindi Kahani: आत्म-स्वरूप का ज्ञान

Darpok Sher Ki Hindi Kahani का अंश:


भेड़ों के बच्चों के साथ वह सिह-शिशु बड़ा होने लगा। हर क्रिया भेड़ों को भांति करने लगा। घास-पात खाकर रहने लगा। भेड़ों से...। इस Darpok Sher Ki Hindi Kahani को अंत तक जरुर पढ़ें...



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Darpok Sher Ki Hindi Kahani: Aatm-Svaroop Ka Gyaan  

     डरपोक शेर की हिंदी कहानी: आत्म-स्वरूप का ज्ञान    



एक गर्भवती सिहनी थी। वह अपनी क्षुधा को शांत करने के लिए शिकार के खोज में जंगल में इधर-उधर भटक रही थी। उसने दूर से भेड़ों के एक झुण्ड को चरते देखा। 

उन पर आक्रमण किया। ज्यू ही छलांग मारी त्यों ही उसके प्राण निकल गये। मातृविहीन सिंघनी के बच्चे का जन्म हुआ भेड़ें उस बच्चे को संभालने-पालने में जुट गयी। 

भेड़ों के बच्चों के साथ वह सिह-शिशु बड़ा होने लगा। हर क्रिया भेड़ों को भांति करने लगा। घास-पात खाकर रहने लगा। भेड़ों से मैं-मैं' करना भी सीख लिया। कृछ वर्षों पशचात वह एक बलिष्ठ सिंह जैसा बलवान बन गया, फ़िर भी वह अपने आपको भेड़ ही समझता था और उन सब में ही अपना जीवन यापन कर रहा था।

उसी जंगल में एक दिन एक सिंह शिकार हेतु आ पहुँचा। उसने उस भेड़- सिंह को देखा। आश्चर्य हुआ-भेड़ों के बीच यह सिह कहाँ से आ गया। 

वह यह समझने के लिए की ' वह‌ भेड़ नहीं, सिह है" ज्यों ही आगे बढ़ा त्यों ही भेड़ों का झुंण्ड दौड़ने लगा और साथ-साथ वह भेड़-सिह भी। 

परन्तु उस सिंह ने उस भेड-सिंह को अपने यथार्थ स्वरुप का भान कराने के लिए प्रयास नहीं छोड़ा। वह सब कुछ देखता रहा कि यह भेड़-सिंह कहाँ रहता है, कहाँ सोता है, क्या करता है। 

एक दिन उसे अकेला देखकर वह छलांग मारकर उसके पास जा पहुँचा और बोला—" अरे! तू भेड़ों के साथ रहकर अपने यथार्थ स्वरुप को कैसे भूल गया '

तू भेड़ नहीं हैं, तू तो सिंह है। इन भेड़ों के बीच रहकर अपने जीवन क्यूँ नस्ट कर रहा है?

 भेड-सिंह ने कहा—मैं तो भेड़ हूँ, सिंह कैसे कहला सकता हूँ? में आपका कहना कभी भी मानने वाला नहीं हूँ, चाहे आप कितना भी प्रयत्न करें। ये कहकर वह भेड़ों की भाँति मिमियाने लगा। 

कुछ ही देर बाद उस सिंह ने "भेड़-सिह" को उठाकर किसी तालाब के किनारे ले जाकर कहा, ' अब देख पानी में, जेंसा प्रतिबिंब मेरा पड़ रहा है वैसा ही प्रतिबिंब तेरा है। तेरा और मेरा आकार समान है। तू अपने सही रूप को भूल रहा है। ' 

यह सुनकर "भेड-सिंह" अपने प्रतिबिंब को देखने लगा। स्वयं के आकार का सही आभास होते ही वह सिंह की तरह गरजने लगा।

हर इन्सान में अनन्त शक्ति है। उस शक्ति का दर्शन ही आत्म-दर्शन है। जब तक मानव उसका दर्शन नहीं कर पाता तब तक वह अपने आपको भेड-सिंह की भांति कमजोर और निर्बल समझता है। पर ज्यों ही उसे आत्म-रूप का ज्ञान हो जायेगा, वह सहजानन्द में रमण करने लग जायेगा।

जब तक आत्मा को नहीं, आत्म-रूप का भान। 

तब लक वह पर-द्रव्य में, करती रमण सहान। ॥।

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..... Darpok Sher Ki Hindi Kahani [ Ends Here ] .....


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