Bharat Ki Gatha: सरस्वती नदी और नचिकेता की कहानी

Bharat Ki Gatha: Sarswati Nadi Aur Nachiketa Ki Kahani
भारत की गाथा: सरस्वती नदी और नचिकेता की कहानी

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Nachiketa ke Teen Var Hindi Kahani

"क्या आपने यह खबर पदी है, ग्रैंडपा?" देवनाथ की ओर दौड़ कर आते हुए उत्तेजित स्वर में संदीप ने पूछा। देवनाथ छड़ी लेकर घूमने के लिए नदी किनारे की ओर जा रहे थे। सूर्यास्त होने ही वाला था और मोह लेने वाली मन्द-मन्द हवा चल रही थी। उस छोटे-से शहर पर एक खुशनुमा शाम उतरने लगी थी।


देवनाथ रुक गये। उन्होंने सारी जिन्दगी इतिहास पढ़ाया था और भारत के अतीत पर बहुत खोज की थी। उनके पास बहुत-से योग्य छात्र थे लेकिन उनमें से कोई भी अपने विषय में संदीप के समान जिज्ञासु नहीं था। वह अभी स्कूल में ही पढ़ता था लेकिन आसमान तले की हर चीज जानने का उसे शौक था। और भला क्यों नहीं, उसके ग्रैंडपा इतने अदभुत जो थे। एक प्रोफेसर, शिक्षाविद और विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में सेवा-निवृत हो जाने के बाद देवनाथ के पास अपने पोते की ज्ञान-पिपासा शान्त करने के लिए काफी समय था। यदि उन्हें बालक के प्रश्न का उत्तर नहीं मालूम होता तो वे स्वयं सीखना चाहते। 


चुनिन्दे ग्रंथों से समृद्ध प्रोफेसर के पुस्तकालय की दोनों मिलकर छानबीन करते। देवनाथ फ्रांसिसी चिंतक बॉलतेयर को बार-बार उद्धृत करते"जितना अधिक मैं पढ़ता है, उतना ही अधिक मनन करता हूँ। जितना ही अधिक मैं जानता हूँ, उतना ही मुझे यह लगता है कि मैं कुछ नहीं जानता।"


संदीप के मन में देवनाथ के प्रति गहरी श्रद्धा थी। उसे ग्रैंडपा के रूप में एक मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक मिल गया था।


"हाँ, मेरे बच्चे, मेरे लिए कौन-सा आश्चर्य लाये हो?" देवनाथ ने पूछा।


"ग्रैंडपा, हमलोगों के प्राचीन साहित्य में एक महान नदी सरस्वती का वर्णन आता है। लेकिन यह कहीं दिखाई नहीं देती। एक बार एक प्रसिद्ध वक्ता ने हमें यहाँ तक बताया कि ऐसी नदी का कभी कोई अस्तित्व था ही नहीं। लेकिन इस पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी है कि लैंडस्टेट नामक उपग्रह ने उस नदी के मार्ग का फोटो लिया है। चौदह कि.मी. चौडी यह नदी हिमालय से बहती थी।"


"बिल्कुल ठीक मेरे बच्चे! इतना ही नहीं, कुछ और भी है। कुछ ही वर्षों पहले एक जाने-माने पुरातत्व वैज्ञानिक पॉल हेनरी फ्रैंक फर्त ने इस महान नदी पर पूरी तरह से शोध किया है। उसके विचार में यह नदी चार हजार वर्ष से भी पहले, शायद बहुत लम्बे समय तक सूखा पड़ने के कारण सूख गई; एक और नदी दृस्द्र्वती का भी यही हाल हुआ।"


'क्या यह कुछ अजीब सा नहीं लगता जब लोग यह कहें कि इनका अस्तित्व कभी था ही नहीं।"


"अजीब सा नहीं। वास्तव में हमलोगों को भारत के अतीत के बारे में बहुत कम जानकारी है। सैकड़ों वर्षो तक हम तामसिक जीवन जीते रहे। हमलोगों ने खोज, गवेषणा या अनुसंधान में पहल नहीं की। परन्तु पश्चिम के अध्ययनशील विद्वानों ने हमारे लिए बहुत कुछ किया। 


उन्होंने साँची जैसे स्मारक और अजन्ता तथा एलोरा जैसे कला के खजानों को ढूंढ निकाला। उन्होंने हमारी बहुत प्राचीन महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की खोज की और उनमें संकलित झान के बारे में हमें बताया। लेकिन साथ ही उन्होंने कुछ ऐसे सिद्धान्त प्रस्तुत किये जो असत्य निकले। उदाहरण के लिए, उन्होंने यह कहा कि आर्यों ने बहुत पहले भारत पर आक्रमण किया था और यहाँ के मूल निवासी द्रविड़ों से युद्ध किया था।


हमारे अपने इतिहासकारों और अध्यापकों ने इसकी सत्यता की जांच किये बिना उस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। हमारी इतिहास की पुस्तकों में यह सिद्धान्त पढ़ाया गया।


लेकिन आज कोई भी गंभीर विद्वान इस बात को देख सकता है कि इस सिद्धांत के समर्थन में प्रमाण का लेख मात्र भी नहीं। दूसरी ओर, इससे भारत को बहुत क्षति पहुंची। हमने अपने आप को दो भिन्न जातियों के रूप में देखा।" ग्रैंडपा ने संदीप को समझाते हुए बताया।


"ग्रैंडपा, जब नदी सूख गई तो इसके तट पर रहनेवाले लोगों की क्या दशा हुई होगी?"


ये दोनों अब नदी के किनारे-किनारे टहलने लगे। देवनाथ का उत्साह बढ़ गया। उन्होंने कहा "उन्हें संकट का सामना करना पड़ा होगा। किन्तु यह संकट अचानक, एक दम नहीं आया होगा। नये चरागाह की तलाश में वे थोड़े-थोड़े, करके कहीं और चले गये होंगे। यह एक विशाल देश था और स्थान का अभाव नहीं था। लेकिन सरस्वती नदी के किनारे जो संस्कृति और साहित्य उन्होंने विकसित किया, ये उनकी महानतम विभूति, हमारे देश के महानतम गौरव बन गये। वे वेद कहे जाते हैं।"


"क्या उन ग्रंथों को वे जहाँ-जहाँ गये, अपने साथ ले गये?"


देवनाथ मुस्कुराये और बोले,-"हाँ, वे वेदों को साथ लेकर जाते रहे- पर केवल अपनी स्मृति में। यद्यपि उन्हें लिखने की कला मालूम थी, फिर भी वे वेदों को कंठस्थ करने की विद्या का अभ्यास करते थे। और ध्यान रहे, चार-चार वेद-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्व वेद।


"अविश्वसनीय सन्दीप ने विस्मय के साथ कहा।


"अविश्वसनीय हम लोगों के लिए; लेकिन उनकी जीवन-शैली हमलोगों से विल्कुल भिन्न थी। मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि उस लुप्त सभ्यता का हर व्यक्ति वेदों को कंठाग्र कर सकता था। लेकिन जो ऐसा करते थे, वे ऋषि कहलाते थे यानी द्रष्टा और मुनि। वे समाज के शिक्षक थे। उन्हें धारणा यानी मन की एकाग्रता की शक्तियों की सिद्धि प्राप्त थी। वे वेद के स्तोत्रों का पाठ एक विशेष लय के साथ करते थे जिससे उन्हें न केवल शब्दों को याद रखने में बल्कि उनके शुद्ध उच्चारण और विराम में भी सहायता मिलती थी।"


"लेकिन वे इतना कष्ट क्यों करते थे, ग्रैंडपा?"


"मैं जानता था, तुम यह प्रश्न पूछोगे। संदीप जब हम किसी चीज के लिए कष्ट उठाते हैं तो हम किसी आनन्द या लाभ के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन कृषियों ने न तो आनन्द के लिए और न लाभ के लिए ऐसा किया। वे जिज्ञासु थे, सत्य के अन्वेषको वे जीवन की पहेलियों और आधारभूत समस्याओं का समाधान खोज रहे थे। हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? मृत्यु के पश्चात हमारा क्या होता है? हमें दुख क्यों होता है? आदि आदि। उनका विश्वास था कि वेदों में इन सभी प्रश्नों के उत्तर हैं।


"लेकिन वेदों को किसने लिखा?"


"यह एक रहस्य है। जैसे हम पुस्तकें, रिपोर्ट या पत्र लिखते हैं, उस अर्थ में उन्हें किसी ने नहीं लिखा। ऋषियों ने उन्हें सुना। इसीलिए इन्हें श्रुति भी कहते हैं-यानी जो ज्ञान सुना गया हो। उनका विश्वास था कि चेतना के ऐसे उच्चतर लोक हैं जहाँ से प्रेरित शब्दों के रूप में मानव चेतना में सत्य उतर सकते हैं।


"काश वे सत्य मुझमें भी उतर पाते!'सन्दीप ने नकली गंभीरता के स्वर में कहा।


"ये भी हमारी तरह मनुष्य थे, संदीप! यदि उनके साथ ऐसा हो सकता था तो तुम्हारे साथ भी हो सकता है। नचिकेता तुम से बहुत छोटा था जब उसने मृत्यु के बाद के जीवन के रहस्य को ढूंढ निकाला।"


"नचिकेता! यह नाम परिचित-सा लगता है।"


"बस, इतना ही! क्या तुम्हें यह नहीं मालूम कि बहुत शताब्दियों से उसका नाम क्यों लिया जाता है?"


"शायद नहीं।"


"वेदों के बाद कई ग्रंथ आये जिन्हें उपनिषद कहते हैं। एक ऐसी ही उपनिषद् में, जिसे कठोपनिषद् कहते हैं, नचिकेता का वर्णन है। उसके पिता मुनि वाजवा यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की पूर्णाहुति पर वे ब्राह्मणों को अपनी वस्तुएं दान दक्षिणा में दे रहे थे।


बालक नचिकेता ने यह सब ध्यान से देखा। फिर, अपने पिता के पास आकर बोला,"आपने मुझे किसे दान में दिया?"


उसने इस प्रश्न को कई बार दुहराया जिससे उसके पिता नाराज हो गये और क्रोध से बोले "यम को।"


नचिकेता चुपचाप यम के पास पहुँच गया, जो और कोई नहीं बल्कि मृत्यु के देवता हैं। परन्तु यम अपने निवास पर नहीं थे। नचिकेता तीन दिनों तक भूखा प्यासा उनके द्वार पर प्रतीक्षा करता रहा।


बालक की सचाई से प्रभावित होकर तीन दिनों तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने के बदले यम ने उसे तीन वरदान दिये।


"मेरे पिता मेरी अनुपस्थिति में चिंतित होंगे। उन्हें शान्ति प्रदान कीजिये।" नचिकेता ने पहला वरदान माँगा।


"तथास्तु।" यम ने कहा।


"मुझे स्वर्ग का ज्ञान बताइए।" नचिकेता ने दूसरा वरदान माँगा।

"तथास्तु।" यम ने कहा।


"मुझे मृत्यु का रहस्य बताइए। मनुष्य के देहान्त के पश्चात् आत्मा कहाँ जाती है? कृपया इसका ज्ञान दीजिए।" नचिकेता ने तीसरा वरदान माँगा।


यम को एक छोटे बालक से ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। "वत्स! मृत्यु और आत्मा का ज्ञान तुम्हारे लिए नहीं है। तुम कुछ ऐसी चीज मांगो जो तुम्हें प्रसन्नता दे सके-दीर्घ जीवन, समृद्धि और शक्तिा"


"हे करुणा निधान! इनमें से कुछ भी सच्चा सुख नहीं दे सकता। हमें वही ज्ञान दीजिए जिसके लिए मैंने प्रार्थना की है। केवल यही ज्ञान मुझे बचा सकता है।" नचिकेता ने आग्रह किया।


अन्त में, यम ने नचिकेता को आत्मा का ज्ञान प्रदान किया जो मृत्यु से परे है और जन्म-जन्म का शाश्वत यात्री है। नचिकेता प्रबुद्ध होकर घर लौटा और एक महान ऋषि के रूप में प्रख्यात हुआ।


"यम का निवास स्थान मालूम करना क्या उनके लिए संभव था?" संदीप ने विनोद के स्वर में पूछा।


"मेरे बच्चे। ऐसी कहानियों को केवल उनके कथानक की रूपरेखाओं से नहीं समझना चाहिए। इनके पीछे सच्चा भाव छिपा रहता है। ऋषि वाजश्रवा मात्र क्रोध करनेवाला या बेटे को शाप देनेवाला नहीं था। यदि इतना ही होता तो उपनिषद में इस प्रसंग के लिए कोई स्थान न होता। मैं समझता हूँ कि उसने अपने बेटे को एक दायित्व सौंपा। उसने मृत्यु के रहस्य पर ध्यान करने का कार्यभार दिया। 


नचिकेता ने उस समस्या पर तीन दिनों तक चित्त एकाग्र किया होगा। इस अवधि के अन्त में उसे यह रहस्योदघाटन हुआ होगा कि आत्मा अमर है।" देवनाथ ने कथा का विश्लेषण करते हुए समझाया।


"आश्चर्यजनक!" सन्दीप प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ा।

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Team: The Hindi Story

श्रीकृष्ण का दौत्य-२ | Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty

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Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty-2
महाभारत स्टोरी हिंदी:  श्रीकृष्ण का दौत्य-२

स्तिनापुर में श्रीकृष्ण-आगमन का समाचार जंगल में आग की तरह फैल गया। धृतराष्ट्र को यह खबर जैसे ही मिली, उन्होंने भीष्म, द्रोण, संजय, विदुर तथा दुर्योधन को बुला भेजा। उनके आ जाने पर निर्देश देते हुए उन्होंने कहा, "आज हस्तिनापुर में कृष्ण आ रहा है, इसलिए उसके स्वागत में यहाँ के सभी मार्गों और वीथियों को तोरण और वन्दनवार से सजा दो। स्थान-स्थान पर आवश्यक सुविधाओं का प्रबन्ध कर दो। ध्यान रखो, उसके स्वागत-सत्कार में कोई त्रुटि न रहे।"


महाराज धृतराष्ट्र के आदेशानुसार दुर्योधन ने हस्तिनापूर के सभी मार्गों के अतिरिक्त वृकस्थल तक जाने वाले पथ को भी अलंकृत द्वारों और पताकाओं से सजा दिया।


श्रीकृष्ण इन सजावटों की ओर बिना ध्यान दिये हस्तिनापुर पहुंच गये। दुर्योधन को छोड़ कर धृतराष्ट्र के अन्य सभी पुत्र भीष्म और द्रोण के साथ अपने-अपने रथ पर उनके स्वागत के लिए आये।


श्रीकृष्णने धृतराष्ट्र के महल के सामने अपना रथ रोक दिया और पैदल ही उनकी राजसभा में पहुंचे। इनके पहुंचते ही धृतराष्ट्र सहित सभी राजे तथा अधिकारी इनके सम्मान में खड़े हो गये।


श्रीकृष्ण ने सबसे पहले भीष्म और धृतराष्ट्र से उनका कुशल-क्षेम पूछा। बाद में अन्य सभी राजाओं और उपस्थित व्यक्तियों से उनकी उम्र के अनुसार बातचीत की। 


धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण को स्वर्ण आसन पर बिठाया। श्रीकृष्ण ने उनका आतिथ्य स्वीकार किया और कुछ देर उनसे बातें कर, विदुर के घर चले गये।


उसी दिन अपराह वे कुन्ती से भी मिलने गये। उन्होंने श्रीकृष्ण को गले से लगा लिया और अपने पुत्रों का कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा,"कृष्ण! मेरे पुत्र मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर वन चले गये। जिन पितृहीन बच्चों को मैंने इतने प्यार से पाला था, भयंकर वन में उन्होंने अपना जीवन कैसे बिताया होगा। धर्मराज, भीम, अर्जुन सकुशल तो हैं? नकुल, सहदेव और कोमलांगी द्रौपदी कैसी हैं? मैं उन्हें कब देख पाऊंगी? तुम्हारे होते हुए भी धर्म परायण आत्माओं की यह दुर्दशा!'' यह कहते-कहते कुन्ती की आँखों में आँसू आ गये।


श्रीकृष्ण ने कुंती को सान्त्वना दी और कहा कि शीघ्र ही तुम्हारे सभी पुत्र, पुत्रवधू और अपने राज्याधिकार के साथ तुमसे मिलेंगे। थोड़ा और धैर्य रखो।


कुन्ती से विदा लेकर वे दुर्योधन से मिलने चले गये। दुर्योधन का महल इन्द्रपुरी के समान भव्य था। वह एक विशाल अलंकृत कक्ष में रत्नजटित सिंहासन पर गर्व के साथ बैठा हुआ था। दुःशासन, कर्ण और शकुनि भी उसके समीप बैठे थे। श्रीकृष्ण के आते ही सब के सब उठ खड़े हुए। दुर्योधन ने उन्हें उनके लिए विशेष रूप से सुसज्जित एक आसन पर बैठाया। 


श्रीकृष्ण ने दुर्योधन तथा वहाँ उपस्थित सभी से कुशल-मंगल पूछा। दुर्योधन ने उस रात अपने ही महल में भोजन और विश्राम कर आतिथ्य स्वीकार करने की उनसे प्रार्थना की। लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी विवशता बताकर उसकी प्रार्थना ठुकरा दी।


इस पर दुर्योधन ने पुनः अनुरोध करते हुए कहा,-"कृष्ण, तुमने तो निष्पक्ष रह कर कौरवों और पांडवों दोनों की सहायता की। इसलिए मैं हृदय से अपना आतिथ्य स्वीकार करने के लिए तुमसे प्रार्थना कर रहा हूँ। फिर क्या कारण है कि तुम इसे ठुकरा रहे हो?"


"मैं यहाँ दूत बन कर आया हूँ। और जब तक मेरा उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक तुम्हारा आतिथ्य नहीं स्वीकार कर सकता।" श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया।


"तुम्हारा उद्देश्य पूरा हो या न हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति में मेरा कोई योगदान होगा, ऐसी धारणा मत बना लेना। तुम हस्तिनापुर आये हो तो इसलिए, तुम्हें आतिथ्य-सत्कार और सम्मान देना हमारा कर्तव्य है। तुम्हें हमारा अनुरोध स्वीकार करना ही चाहिए।" दुर्योधन ने औपचारिक भाव से कहा।


दुर्योधन के मनोभाव को ताड़ कर श्रीकृष्ण मुस्कुराये और बोले,-"दो तरह के व्यक्तियों के साथ भोजन करने का आनन्द है। प्रेम करने वालों के साथ और विपत्ति में फंसे लोगों के साथ हमारे प्रति तुम्हारे हृदय में प्रेम नहीं है। अपने ही परिवार के पांडवों के प्रति तुममें जरा भी प्यार नहीं है। तुम उनसे अकारण द्वेष करते हो और अपना शत्रु मानते हो। उनके धर्मानुसार आचरण पर किसी ने उंगली नहीं उठाई। इसीलिए वे हमें प्रिय हैं। उनसे शत्रुता का अर्थ है मुझसे शत्रुता। सच तो यह है कि आतिथ्य के लिए मुझ से तुम्हारा अनुरोध ही अनुचित है।"


इतना कह कर श्रीकृष्ण वहाँ से उठकर विदुर के घर चल पड़े और वहीं भोजन किया।


भोजन के उपरान्त विदुर ने श्रीकृष्ण से कहा,"कृष्णा लगता है, यहाँ आकर तुमने ठीक नहीं किया दुर्योधन का मन सभी कर्तव्यों और मूल्यों को अलग रख कर सिर्फ युद्ध पर टिका हुआ है। कर्ण का दंभ है कि वह अकेला ही सभी पांडवों को परास्त करने के लिए काफी है। इसलिए यह शांति का विरोधी है। कर्ण के बल पर दुर्योधन भी युद्ध के लिए मचल रहा है। इसके अतिरिक्त उसकी सेना की शक्ति भी बहुत अधिक है। 


उसके पक्ष के राजे तुम्हारे पुराने शत्रु हैं। इसलिए वे सभी तुम्हारी हर बात का विरोध करेंगे, चाहे तुम कुछ उनके भले के लिए ही क्यों न कहो। यद्यपि तुम्हारी शक्ति पर मुझे पूरा विश्वास है, फिर भी मैं चाहता हूँ कि तुम उनके समझ जाओ ही नहीं।"


विदुर से सहमत होते हुए श्रीकृष्ण ने कहा,"मित्र के स्नेह के नाते तुमने ठीक ही परामर्श दिया है। तुमने जो कहा है, वही होगा भी। फिर भी, यह मेरा धर्म है कि शांति के लिए और उभय पक्षों को विनाश से बचाने के लिए मैं भरसक प्रयास करूं। हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाना उचित नहीं होगा। यदि ऐसा नहीं किया तो संसार मुझ पर यह दोषारोपण करेगा कि मैंने ही दोनों पक्षों को सर्वनाश की ज्वाला में झोंक दिया। जहाँ तक उनके सामने जाने से मुझ पर संकट आने का प्रश्न है, उसकी तुम चिंता मत करो।"


उस रात श्रीकृष्ण ने विदुर के घर पर ही विश्राम किया। दूसरे दिन प्रातःकाल दैनिक दिनचर्या से निवृत हो जैसे ही श्रीकृष्ण रथ की ओर बढे कि धृतराष्ट्र की ओर से दुर्योधन और शकुनि उन्हें राजसभा में ले जाने के लिए आ गये। उनके साथ अनेक राजा भी हाथियों व घोड़ों पर सवार होकर आये थे। उन सब के बीच राजमार्ग पर जाते हुए अपने रथ पर सवार श्रीकृष्ण ऐसे शोभित हो रहे थे मानो सितारों के बीच पूर्व क्षितिज-पट पर चन्द्रमा उदित हो रहा हो। इस मनोहर दृश्य को देखने के लिए स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभी मार्गों व घर के परकोटों पर उमड़ पड़े।


धृतराष्ट्र की राजसभा के मुख्य द्वार पर श्रीकृष्ण के संकेत पर सारथि दारुक ने रथ रोक दिया। सात्यिकी और विदुर के साथ श्रीकृष्ण ने सभा में प्रवेश किया। समस्त सभासदों ने खड़े होकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया और सम्मान के साथ विशिष्ट आसन पर बैठाया। विदुर और सात्यिकी ने इनके समीप ही अपना आसन ग्रहण किया।


सभा में थोड़ी देर तक मौन छाया रहा। सब की दृष्टि श्रीकृष्ण पर टिकी थी। श्रीकृष्ण ने बारीबारी से सबके ऊपर दृष्टि डाली। धृतराष्ट्र पर नजर पढ़ते ही उन्हें सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा,"यद्यपि कौरवों और पांडवों दोनों की ओर से युद्ध की तैयारियाँ हो चुकी हैं, फिर भी राजन! मैं पांडवों की ओर से आप के पास शांति का सन्देश लाया हूँ। पांडव यद्यपि शान्ति के पक्ष में नहीं हैं, फिर भी युद्ध की भीषण विभीषिकाओं को देखते हुए. मैं उन्हें शान्ति के लिए मना लूंगा।


"भारत के सभी राजवंशों में कुरु वंश सर्वश्रेष्ठ है और आप उस वंश के शीर्ष हैं। यदि युद्ध हुआ तो कुरुवंश के विनाश के साथ-साथ सभी राजवंशों का विनाश हो जायेगा और इसका कलंक आप पर लगेगा। यदि आप के वंश का कोई व्यक्ति अधर्म करे, नीति विरुद्ध कार्य करे तो उसे दण्ड देना आप का अधिकार और धर्म है।


"आप के पुत्रों ने धर्म की सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित का विवेक खो दिया। पाण्डवों पर अमानवीय अत्याचार किये। वे समर्थ होते हुए भी मेरे कहने पर यह सब सहते रहे। यह सब आप जानते हैं। यदि युद्ध का विनाशकारी संकट आया तो इसका दायित्व कौरवों पर होगा। लेकिन आप चाहें तो कुरु वंश को बचा सकते हैं। आप चाहें तो कौरवों और पांडवों के बीच शान्ति की स्थापना कर सकते हैं। आप अपने पुत्रों को अनुचित और धर्म विरुद्ध कार्य करने से रोक सकते हैं। उन्हें सन्मार्ग पर चलने का आदेश दे सकते हैं। यह सब करने का अधिकार आप को है। आप उन्हें अपने न्यायपूर्ण आदेश का पालन करने पर बाध्य कर सकते हैं, आप उनके पिता और सम्राट हैं।


"पांडवों को युद्ध में कोई भी नहीं जीत सकता। वे अजेय हैं। यदि युद्ध नहीं हुआ और आपने पांडवों के साथ सन्धि कर ली तो इससे आप का ही हित साधित होगा। जब तक पांडव आप के साथ रहेंगे, तब तक आप इस पृथ्वी पर निष्कंटक राज्य करेंगे, क्योंकि उन्हें परास्त करने वाली कोई शक्ति अभी तक धरती पर नहीं उतरी। और यदि युद्ध हुआ तो आप को कोई लाभ नहीं होगा, चाहे कोई भी जीते। 


इस युद्ध में संसार के सभी राजा भाग लेंगे और युद्ध की ज्वाला में कीटों की तरह मर मिट जायेंगे। संसार वीरों से खाली हो जायेगा। आप चाहें तो संसार को इस विनाश से बचा सकते हैं।


“आप अपने पुत्रों को सन्मार्ग पर लाइ मैं पांडवों की क्रोधाग्नि को शान्त करूंगा। इस प्रकार शान्ति संभव है।


"फिर, पितृहीन पांडवों का आप के सिवा कौन अपना है! संकट के समय वे किसके पास जायें? वे भी आप के ही संतान हैं। वैसे भी उन्होंने आप का और आप के पुत्रों का क्या बिगाडा है? आप जानते ही हैं कि धर्मराज कैसा सरल हृदय है। लाख के महल में जलाया गया तब भी वह आप के पास आया। आपने उसे इन्द्रप्रस्थ भेज दिया तो वह चुपचाप चला गया। शकुनि ने उसे धोखे से छला फिर भी उसने अपने वचन का पालन किया।


"और अन्त में पूरी सभासे कौरवों और पांडवों के हित को ध्यान में रख कर याचना करता हूँ कि पांडवों के पिता का आधा राज्य न्याय और धर्मपूर्वक उन्हें लौटा दें और कुरु वंश के साथ-साथ सभी राजवंशों को सर्वनाश से बचा लें। और यहाँ उपस्थित सभी राजा एक साथ बैठकर प्रेम के साथ भोजन करें और पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और शत्रुता त्याग कर अपने-अपने राज्य लौट जायें।


"लेकिन यदि सभा ने अधर्म और अन्यायपूर्ण निर्णय लिया तो तजनित पाप के भागी ये सभी होंगे जो ऐसे निर्णय के साक्षी होंगे।


"मैं हर प्रकार से सोच-विचार कर ही ये बातें सम्पाट और उनकी सभा को बता रहा है। आगे सोचविचार कर निर्णय लेना आपके हाथ में है।"


श्रीकृष्ण इतना कह कर मौन हो गये। पूरी सभा में बहुत देर तक सन्नाटा छाया रहा।


कुछ देर के बाद परशुराम ने धृतराष्ट्र को सम्बोधित करके प्राचीन काल के अहंकारी राजा दम्बोद्भव का प्रसंग सुनायाः


दम्बोद्भव प्रतिदिन अपनी प्रजासे अपनी वीरता की डींग हॉकता और पूछता- 'मुझसे श्रेष्ठ योद्धा इस पृथ्वी पर कौन है?


ऋषि-मुनि उसे समझाते कि इतना अति आत्म-विश्वास घातक होता है। लेकिन उसे ज्ञान नहीं हुआ। अन्त में ऋषियों ने बता दिया कि गन्धमादन पर्वत पर रहनेवाले दो तपस्वी बडे भारी योद्धा हैं।


दम्बोद्भव अपनी सारी सेना लेकर गन्दमादन पर्वत पर पहुंच गया। दोनों तपस्वियों ने उसका स्वागत किया और आतिथ्य ग्रहण करने की प्रार्थना की। 


पर दम्बोद्भव ने दंभ के साथ उतर दिया- 'युद्ध ही हमारे लिए आतिथ्य है।' तपस्वियों ने फिर उसे समझाया कि यह प्रदेश तपोभूमि है और युद्ध के लिए उपयुक्त नहीं है। दम्बोद्भव तब भी उन्हें युद्ध के लिए, ललकारता रहा।


तब एक तपस्वी ने कुश का एक तिनका दम्बोद्भव की सेना पर फेंक दिया। उसकी सेना सो गयी और दम्बोद्भव शिथिल हो गया। उसका दम्भ जाता रहा और वह तपस्वी के चरणों में गिर कर माफी मांगने लगा।


'अपने प्रलापों को त्याग कर प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करो, तभी उत्तम राजा बन सकते हो।' इतना कह कर तपस्वी ने आँखें बन्द कर ली और फिर तपस्या में लीन हो गये।


वे दोनों तपस्वी नर और नारायण थे। जिसने कुश का तिनका सेना पर फेंका था, वे नर थे और दूसरे नारायण थे। वे ही नर-नारायण अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। अर्जुन गांडीव उठाये, उसके पहले ही अपना दंभ छोड़ कर उसकी शरण में चले जाओ। इसी में तुम्हारा और तुम्हारे वंश का कल्याण है। इतना कह कर परशुराम चुप हो गये।


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..... Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty .....


Team: The Hindi Story

1857 की वीर गाथा | प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम | Rani Laxmi Bai Ki Kahani

 

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Rani Laxmi Bai ki 1857 ki Veer Gatha Ki Kahani | Pratham Swatantrata Sangaram

Rani Laxmi Bai Ki Kahani | Pratham Swatantrata Sangaram | 1857 ki Veer Gatha
१८५७.की वीर गाथा | प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम | रानी लक्ष्मी बाई की कहानी 

 पूरे देश में यत्र-तत्र क्रान्ति की आग धधक रही थीं। क्रान्ति के दो महान युवा नायक थे-झाँसी की रानी और नाना साहेब ब्रिटिस सरकार ने राजा की मृत्यु के बाद बिना कारण झाँसी का राज्य हड़प लेने का प्रयास किया था किन्तु रानी ने ऐसा होने नहीं दिया। उसने बहादुरी के साथ आक्रमणकारी ब्रिटिश सेना का सामना किया। किन्तु जब किले को बचाना संभव न रहा तो वह अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांध, पुरुष वेश में घोड़े पर सवार हो, अंग्रेजों की सेना से बचती हुई, किले के मुख्य द्वार से बाहर निकल गई।


रानी अपनी दो विश्वासपात्र परिचारिकाओं मन्दर और काशी के साथ आगे बढ़ती गई। छोटी परन्तु बहादुर सेना की एक टुकड़ी उनका पीछा कर रही थी। रानी को बार-बार पीछे मुड़कर पीछा करनेवालों का सामना करना पड़ता था।


वह निरन्तर, पूरे दिन, विश्राम किये बिना घोडे पर सवार आगे बढ़ती रहीं। उनका पहला गन्तव्य कालपी था। झाँसी से पिछली रात चल कर कहीं आधी रात को कालपी पहुंची।


नाना साहेब के चचेरे भाई और सच्चे देशभक्त रावसाहेब के महल के सामने मशाल लेकर सन्तरी पहरा दे रहे थे।


"रानी! झाँसी की रानी यहाँ!" सन्तरी आपस में फुसफुसा रहे थे।


राव सादेव ने बाहर आकर रानी का स्वागत किया। जैसे ही रानी घोड़े से उतरी, महल की स्त्रियों ने उनके सोते हुए पुत्र को संभाला। पुरुषों ने उनके घोड़े की लगाम ले ली।


आह लगता है घोडे ने पूरी निष्ठा से अपने स्वामी के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर दिया था। वह अचानक वहीं धम्म से गिर पड़ा और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण-पखेरू उड़ गये।


रानी ने घुटनों के बल बैठ उसे प्यार से थपथपाया। उनकी आँखों से आंसू टपक पड़े, मानो वे अपने मूक सेवक के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हों।


परन्तु रानी के पास विश्राम के लिए समय कहाँ था? सुबह होते ही वह राव साहेब के साथ रणनीति निश्चय करने के लिए बैठ गईं। रानी के गुप्तचरों ने समय से पूर्व यह सूचना दी कि झाँसी में सारा दिन लूट-मार और कल्लेआम करने के बाद भारत में ब्रिटिश राज के कर्णधार सर ह्यूग रोज के नेतृत्व में आधी सेना इसी ओर बढ़ी आ रही है।


रानी, राव साहेब तथा एक अन्य महान क्रान्ति नायक तात्या टोपे ने उस क्षेत्र के तीन-चार राजाओं-सामन्तों के सैनिकों को, जो इनकी सेवा में तैनात थे, एकत्र किया तात्या टोपे के नेतृत्व में ये सैनिक इसी ओर आती हुई अंग्रेजी सेना की दिशा में बढ़ने लगी कुंद गाँव में दोनों सेनाएं टकरा गई।


दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ दुर्भाग्यवश तात्या टोपे को अपने सैनिकों को एक अनुशासन में संगठित करने का पर्याप्त समय नहीं मिला था। इसलिए कुछ घण्टों के युद्ध के पश्चात इन्हें पीछे लौटना पड़ा। अंग्रेजी सेना ने कालपी में प्रवेश कर नगर को खूब लूटा। अपने कारखाने में बनी हुई बन्दूकों तथा बारूद के विशाल भण्डार से भरा राव साहब का शस्त्रागार सर ह्यूग रोज के लिए एक बड़ा तोहफा साबित हुआ।


अंग्रेजों ने इस विजय पर खूब खुशियां मनाई। किन्तु, रानी लक्ष्मीबाई, राव साहेब तथा तात्या टोपे में से किसी को भी बन्दी बनाने में विफल हो जाने के कारण वे निराश हो गये। ये तीनों नेता अपनी सेना का पुनर्गठन कर ग्वालियर पहुंच गये। ग्वालियर के राजा सिंधिया अंग्रेजों के समर्थक थे। लेकिन कुलीन और जन साधारण वर्ग के मन में क्रान्तिकारियों के लिए आदर-भाव था।


जैसे ही क्रान्तिकारी म्वालियर पहुँचे, राजा सिंधिया शहर छोड़कर भाग गया। रानी तथा इनके सहयोगियों का भव्य स्वागत किया गया। ट्यूग रोज ने इसे अपना घोर अपमान समझा। वह जानता था कि यदि सिंधिया को ग्वालियर वापस नहीं मिला तो अन्य राजा ईस्ट इण्डिया कम्पनी की, उनकी रक्षा करने की, शक्ति में विश्वास खो देंगे। भाग्य से झाँसी अब पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण में था। अंग्रेजी सेना का वहाँ रहना आवश्यक नहीं था। ह्यूग रोज़ ने वहाँ से सैनिकों को बुला लिया और एक बड़ी सेना संगठित कर ग्वालियर चल पड़ा। उसने सिंधिया को अपनी सेना का अगुआ बना दिया। यह चाल उसके लिए वरदान सिद्ध हुई। 


ग्वालियर की प्रजा ने क्रान्तिकारियों का स्वागत-सम्मान किया था। वे चाहते थे कि अंग्रेज हमारा देश छोड़ कर वापस चले जाएं। फिर भी अपने परंपरागत शासक के प्रति उनमें स्वाभाविक सहानुभूति थी। जब उन्होंने देखा कि अंग्रेजों से लड़ने का अर्थ है अपने राजा से लड़ना, तो वे निष्पक्ष हो गये। 


रानी ने बहुत बहादुरी और दृढ निश्चय के साथ अंग्रेजी सेना से मुकाबला किया। वह युद्ध में सदा अपनी सेना के आगे रहा करती थीं। दुर्भाग्यवश उनका विश्वासी घीड़ा पहले ही मर चुका था। जिस नये घोड़े पर वह सवार थीं, वह इनके युद्धाभ्यास की गतियों और युक्तियों से परिचित नहीं था, जबकि शत्रु बेरहम था। सर ह्यूग रोज एक कुशल और अनुभवी सेनापति था। अंग्रेज कप्तान इसके अधीन कई युद्ध लड़ चुके थे। फिर भी, रानी ने, जो सिर्फ २० वर्ष की थीं, उन्हें काफी समय तक घमासान युद्ध में उलझाये रखा। 


इनकी एक मात्र पूंजी जी थी-अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति। इनके सैनिक समर्पित अवश्य थे किन्तु अधिकांश प्रशिक्षित नहीं थे। इसलिए वे पेशेवर अंग्रेजी सैनिकों के चालबाजी भरे आक्रमण का सामना नहीं कर सके। यदि ग्वालियर इनका साथ देता तो स्थिति भिन्न हो जाती।


दोपहर के काफी बाद रानी के सेनाधिकारियों ने वापस लौट जाने की सलाह देते हुए कहा,"इस समय युद्ध में प्राण देने का औचित्य नहीं है। यदि आप जीवित रहीं तो आप के झण्डे के नीचे हमलोग फिर से संगठित हो सकते हैं।"


रानी उनके सुझाव का आदर करती हुई मन्दर, काशी और मुट्ठी भर सैनिकों के साथ युद्ध क्षेत्र छोड़ कर पीछे लौट पड़ीं। वह घोड़े पर सवार बहुत तेज रफ्तार में जा रही थीं। शत्रु सेना भूखे भेड़िये की तरह उनका पीछा कर रही थी। उन्हें मालूम था कि यदि रानी को जीवित या मृत पकड़ लिया तो मालिकों से उन्हें जिन्दगी का सबसे बड़ा इनाम दिया जायेगा।


रानी ने एक चौरास्ते पर आकर एक तंग गली में घोड़े को मोड़ दिया। पीछा करनेवालों को पता न चला कि वह किस दिशा में गई है। इसलिए वे टुकड़ियों में बँट कर चारों ओर फैल गये। रानी के अंगरक्षक अचानक रुक गये और पीछा करने वाले अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया।


रानी कुछ दूरी तर सुरक्षित भागती रहीं। शत्रु की दूसरी टुकड़ी के सिपाही उनका पीछा करते देखे गये। मार्ग में एक तंग नदी आ गई। रानी अपने पुराने घोड़े पर इससे अधिक चौड़े नाले को छलांग लगा कर पार कर जाती थीं। किन्तु नया घोड़ा उतना योग्य नहीं था। वह रुक गया और घबरा कर नदी के किनारे दुलकी चलने लगा।


तभी शत्रु के सिपाही निकट आ गये और रानी के सैनिकों पर टूट पड़े। मन्दर घायल हो गई। रानी नदी किनारे एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच गई थीं जहाँ पानी छिछला था और उसे आसानी से पार कर सकती थीं। लेकिन मन्दर की चीख ने उन्हें वापस लौटने पर बाध्य कर दिया। उन्होंने तलवार के एक ही बार में उसके आक्रमणकारी का काम तमाम कर दिया। फिर घोडे से उतर कर घायल मन्दर को संभाला। तभी एक कायर ने उनके सिर पर तलवार चला दी। रानी के अंगरक्षकों ने तुरन्त उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। फिर रक्त से लथपथ रानी को एक निकटवर्ती कुटिया में ले आये।


"मेरे बहादुरों!" मरणासन्न रानी धीमी आवाज में बोली, "मेरे प्राण निकलते ही मेरा दाह-संस्कार कर देना। शत्रु आने ही वाले हैं। मैं चाहती हूँ कि मेरे शरीर को स्पर्श कर वे इसे अपवित्र न करें।"


सचमुच अगले ही क्षण उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। उनके विश्वासी सेवकों ने सूखी पत्तियाँ और लकड़ियाँ एकत्र कर उनका अन्तिम संस्कार कर दिया।


इस प्रकार भारतीय इतिहास का एक चमकता सितारा सदा के लिए अस्त हो गया। इतिहास में इनके समकक्ष एक मात्र व्यक्तित्व था-जोन ऑफ आर्क।


जवाहर लाल कहते हैं-"एक नाम दूसरों से अलग थलग लोक-स्मृति में जो आज भी ताजा है, वह है झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, बीस वर्ष की एक बाला जो देश के लिए लड़ते-लड़ते जान पर खेल गई। विरोधी अंग्रेज सेनापति ने जिसके लिए कहा था,-"सर्वोत्तम और श्रेष्ठतम वीरांगना।"


यह क्रान्ति शीघ्र ही समाप्त हो गई, क्योंकि क्रान्ति के नायक एक-एक कर या तो बहादुरी से युद्ध करते हुए मारे गये या फाँसी के तख्ते पर झूल गये।


शूरवीरता, साहस, दूरदर्शिता और नेतृत्व-भारत में इन गुणों का कभी अभाव नहीं रहा। जिस गुण का यहाँ अभाव था, वह था-तात्कालिक राजाओं में एकता। उनमें एक दूसरे को नीचा दिखाने की एक जबरदस्त होड़ थी। उनमें कुछेक तो अपने ही देश के दुश्मनों और प्रतिद्वन्द्वी राजाओं से लड़ने के लिए विदेशी शक्तियों से भी मदद लेने में शर्म नहीं करते थे। इसके अतिरिक्त, अंग्रेजी सेना अधिक श्रेष्ठ थी और उसमें पेशेवर सैनिक थे, जबकि भारतीय सेना में स्वाधीनता के भाव से प्रेरित सामान्य जन थे जो युद्ध कौशल में प्रशिक्षित नहीं थे।


क्रान्ति समाप्त होते ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कप्तानों और सैनिकों ने भारतीयों पर निर्मम अत्याचार किया हजारों निर्दोष व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया गया और सैकड़ों गाँव जला कर राख कर दिये गये। महलों और किलाओं को बर्बरता से लूटा गया। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को, जिन्होंने क्रान्तिकारियों को समर्थन दिया था, बन्दी बना कर रंगून निर्वासित कर दिया गया, जहाँ वृद्धावस्था और मायूसी में उन्होंने दम तोड़ दिया।


जो भी हो, ब्रिटेन की जनता और नेताओं ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की, इसके अनाचारों, नीचताओं और दुर्व्यवस्थाओं के लिए, खूब खबर ली। भारतीय प्रशासन की जाँच कराई गई। महारानी विक्टोरिया ने राजक्षमा की घोषणा की और भारतीय राजाओं के तात्कालिक अधिकारों को स्वीकार कर लिया।


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..... Rani Laxmi Bai Ki 1857 Ke Yudh ki Kahani .....


Team: The Hindi Story

द्रोण के जन्म की कथा | Drona Ke Janm Ki Kahani Mahabharat


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Drona Ke Janm Ki Kahani Mahabharat
द्रोण के जन्म की कहानी महाभारत 

द्रोण के जन्म की भी बड़ी विचित्र कहानी है। एक बार महर्षि भारद्वाज जी अपने अनेक मुनि मित्रों को साथ ले गंगा स्नान को गये तो वहीं पर उन्होंने एक अप्सरा को गंगा में स्नान करके निकलते देखा।

बस फिर क्या था-महर्षि भारद्वाज जी का चंचल मन नग्न रूपवती को देखते ही मचल उठा। उसके गीले वस्त्र उसके सुन्दर शरीर पर ऐसे चिपक गये थे...जैसे उसने कोई वस्त्र ही न पहना हुआ हो।


भारद्वाज जी अपनी काम वासना की आग पर काबू न पा सके। उनका शरीर अन्दर ही अन्दर जलने लगा। वहीं पर उनके शरीर से वीर्य निकलकर द्रोण नामक यज्ञ पात्र में गिरा।


बस वहीं से द्रोण नामक बालक का जन्म हुआ, जो आगे चल कर द्रोणाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुये। द्रोणाचार्य, बचपन से ही प्रभु भक्त थे। छोटी आयु में ही उन्होंने भगवान की तपस्या आरम्भ कर दी। वे अपने आश्रम में रहने लगे। उनकी शादी शरद्वान की पुत्री कृपी से हुई...जिसके पेट से अश्वत्थामा नाम के एक पुत्र ने जन्म लिया।


एक बार जन्मदिग्न पुत्र परशुराम ने अपना सब कुछ ब्राह्मणों को दान कर दिया। उनके पास उनका शरीर और दिव्यअस्त्रों के सिवा और कुछ नहीं बचा था।


यह सुनते ही द्रोणाचार्य महेन्द्रांचल पर्वत पर पहुंच गये। यहां पर परशुराम रहते थे। परशुराम जी ने एक ब्राह्मण को अपने पास आते देखकर पूछा

"कहो ब्राह्मण युवक! मेरे पास क्या करने आये हो ?" 

“आपसे शस्त्र लेने-ब्राह्मण हूं, भिक्षा लेने आया हूं।"

"ठीक है, तुम सब ले जाओ।" 

परशुराम ने अपने सारे शस्त्र द्रोणाचार्य को दे दिये, साथ ही शस्त्र विद्या का ज्ञान भी। परशुराम ने अपना सब कुछ दान में देकर सन्यास ले लिया था।


द्रोणाचार्य महान शस्त्र विद्याधारी बनकर वहां से पांचाल देश के राजा द्रुपद के यहां पहुचे। वे दोनों पुराने मित्र थे। इन्होंने शस्त्र विद्या पहले एक ही गुरु से प्राप्त की थी।


छात्र जीवन में राजा द्रुपद ने कहा था कि जब मैं पांचाल देश का राजा बन जाऊंगा तो अपने राज्य का आधा भाग तुम्हें दे दूंगा।


द्रोणाचार्य गरीब ब्राह्मण थे। वे यही आशा लेकर द्रुपद के पास पहुंचे थे कि उसे अपनी प्रतिज्ञा याद दिला दूं। यदि वे अपने राज्य का आधा भाग नहीं भी देंगे तो कम से कम इतना धन तो दे देंगे जिससे वह अपने घर का गुजारा चला लेंगे।


किन्तु जैसे ही द्रोणाचार्य राजा द्रुपद के दरबार में पहुंचे और उसे उसकी मित्रता और प्रतिज्ञा याद दिलाई तो राजा द्रुपद ने साफ कह दिया-

“अरे ओ कंगाल ब्राह्मण" कभी तूने यह सुना भी है कि किसी कंगले का कोई राजा मित्र हो? जाओ तुम अपने जैसे लोगों में रहो।"


द्रोणाचार्य क्रोध से भरे अपने मन में प्रतिशोध की आग लिये हस्तिनापुर आ गये। वहीं जंगल में उनकी भेंट भीष्म जी से हुई। उन्होंने बुद्धिमान और महाज्ञानी पडित को झट से पहचान लिया कि यह द्रोणाचार्य है, बस उन्होंने अपने वंश के सभी युवकों को गुरु द्रोणाचार्य जी से शस्त्र विद्या प्राप्त करने के लिये वहां भेज दिया।


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..... Drona Ke Janm Ki Kahani Mahabharat .....


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Dushala Ka Janm Mahabharat | कृपाचार्य द्रोणाचार्य की जीवन कथा

दुःशाला का जन्म | Dushala Ka Janm

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Dushala Kripacharya Aur Dronacharya Ki Katha Kahani

गान्धारी सौ पुत्रों की मां बन गई तो उसके मन में एक कन्या की और लालसा पैदा हुई। बस इसी इच्छा को लेकर उसने तपस्या आरम्भ की।

व्यास जी की कृपा से उनके घर में दुःशाला नाम की कन्या ने जन्म लिया। 

एक बार राज पांडू मुनि का शाप भूलकर अपनी पत्नी माद्री के साथ सम्भोग करने लगे तो उसी समय उन दोनों की मृत्यु हो गई।

कुन्ती अपने पांचों पुत्रों को लेकर वापस हस्तिनापुर आ गई। बेचारी कुन्ती जवानी में ही विधवा हो गई। पति का दुःख उसके ऊपर पहाड़ बनकर टूट पड़ा था। अब बेचारी का जीवन सूना हो गया था।

हस्तिनापुर में पांडव पुत्रों ने कौरवों के साथ खेलना आरम्भ कर दिया। पांडव हर कार्य में कौरवों से आगे रहते थे। हर खेल में कौरवों की हार होती और पांडवों की जीत। इनकी जीत का श्रेय वीर भीमसेन को ही जाता था।


भीम की यह बहादुरी देखकर दुर्योधन अन्दर ही अन्दर जलने लगा था। अब उसे भीमसेन अपना सबसे बड़ा शत्रु नजर आने लगा था। वह मन ही मन में यह सोचने लगा कि इस शत्रु को रास्ते से कैसे हटाया जाए?


एक दिन दुर्योधन ने भीमसेन के खाने में जहर मिला दिया, जिसके कारण भीमसेन बेहोश होकर नदी के किनारे गिर गये। तभी दुर्योधन ने भीमसेन को टांग से घसीट कर नदी में फेंक दिया।


भीमसेन सीधे पाताल लोक पहुंच गये। वहां पर सांपों ने उनके शरीर का सारा जहर चूस लिया। इसके बाद वे पहले से भी अधिक शक्ति प्राप्त कर पृथ्वी पर वापस आ गये। आते समय नागराज ने उसे अपना आशीर्वाद दिया और कहा कि संकट के समय हमें अवश्य याद करना मित्र। फिर सब भाई मिलकर कृपाचार्य के पास शिक्षा प्राप्त करने लगे।

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कृपाचार्य और द्रोणाचार्य की जीवन कथा

महर्षि गौतम के पुत्र शरद्वान, जो बाणों के साथ ही पैदा हुए थे, उन्होंने तपस्या की शक्ति से ही सारे शस्त्रों को चलाना सीखा।


शरद्वान की तपस्या के डर से राजा इन्द्र ने अपनी गद्दी खतरे में देखकर अपने अखाड़े की एक सुन्दर अप्सरा को उसकी तपस्या भंग करने के लिये भेजा।


अप्सरा ने अपनी सुन्दरता का जादू चलाकर शरद्वान को वहां से भागने पर मजबूर कर दिया। भागते-भागते उसके शरीर का एक अंग सरकन्डों से कट गया। जिस कारण शरद्वान का खून वहां गिरा।


 शरद्वान तपस्वी के खून से एक कन्या तथा एक पुत्र पैदा हुये। अचानक ही राजा शान्तनु शिकार खेलते हुये उस ओर आ निकले।  उनके किसी सेवक की नजर उन तेजस्वी बच्चों पर जा पड़ी। उसने राजा को सूचना दी।


शान्तनु जी उन्हें उठाकर अपने महल में ले आये....उन्होंने लड़के का नाम कृपा और लड़की का कृपी रखा। इन दोनों बच्चों की शिक्षा भी बड़े-बड़े महर्षियों के पास ही हुई थी, जिसके कारण वे दोनों अत्यन्त ज्ञानी हुये।


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..... KripaCharya Aur Dronacharya ki Jivan Katha Mahabharat  .....


Team: The Hindi Story

Hindi Kahani Mahabharat Ki: पाँडव तथा कौरवों की जन्म की कहानी

 


Pandav Ke Janam Ki Katha: Maharaja Pandu Ka Shrap
पांडव के जन्म की कथा: महाराज पांडू का श्राप 


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Pandav Ke Putra Ke Janam Ki Kahani Mahabharat Story

महाराज पांडू बहुत ही पराक्रमी व धर्मात्मा राजा थे। वे बहुत दयालु, दानी और प्रजा के हर दुःख-सुख के साथी थे। तभी देश की सारी प्रजा उससे हार्दिक प्यार करती थी।

एक बार राजा पांडू अपनी पत्नी कुन्ती व माद्री सहित शिकार खेलने गये तो रास्ते में किन्दम नामक तपस्वी मुनि, मानव लज्जा के कारण पति-पत्नी, हिरण और हिरणी का रूप धारण कर, सम्भोग आनन्द ले रहे थे। पांडू राजा ने उन्हें अपना शिकार समझकर उन पर तीर चलाया।


उसी समय हिरण के सीने में तीर लगा। वह सम्भोग आनन्द को बीच में छोड़ फिर मुनि के रूप में वापस आये और उसी समय राजा को शाप दिया


“हे राजन, जिस प्रकार तुमने सम्भोग आनन्द के समय मेरा खून किया है। इसी प्रकार तुम भी स्त्री सम्भोग के समय ही मृत्यु प्राप्त करोगे।"


राजा पांडू मुनि का शाप सुनकर बहुत दुःखी हुये, अपनी दोनों पत्नियों को मुनि के शाप के बारे में बताया।

दोनों पत्नियों ने मुनि के शाप को तोड़ने के लिये उसी समय जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन करने की प्रतिज्ञा की और वे सब नागशत पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगे।


सबने मिलकर घोर तपस्या तो की परन्तु उनके मनों में यह भय तो हर समय लगा रहता कि यदि वे ऐसे ही जीवन भर तपस्या करते रहे तो उनके वंश का क्या होगा? इस प्रकार तो उनका वंश ही मिट जायेगा...कोई पांडवों का नाम तक नहीं लेगा।

दूसरी ओर मृत्यु का भय था-जिसे मुनि ने शाप के रूप में दिया था। अब तो केवल अपनी तपस्या के बल पर ही सन्तान प्राप्त कर सकते थे। हुआ भी यही। वर्षों की तपस्या के बाद कुन्ती को धर्मराज की ओर से वरदान मांगने का आदेश हुआ। सुबह के समय स्वयं धर्मराज प्रकट हुये।


“कुन्ती! तुम्हारी तपस्या सफल हुई-तुम अपना मनचाहा वर मांग सकती हो।"

"महाराज! मुझे आप जैसे किसी धर्मी पुत्र की ही इच्छा है...तभी तो मैंने इतने वर्षों तक केवल आपकी ही तपस्या की है...।"

“ठीक है-तुम्हारी यह मनोकामना अवश्य पूरी होगी।" यह कहकर धर्मराज लुप्त हो गये।


कुछ समय पश्चात् धर्म पुत्र युधिष्ठर का जन्म हुआ। युधिष्ठर के पश्चात् राजा पांडु और कुन्ती ने वासुदेव, वरुण की पूजा करके उनसे भीम को वरदान के रूप में मांग लिया। भीम महा शक्तिशाली वीर था। उसके बचपन की यह घटना मां कुन्ती को हर समय याद रहती।

जब एक बार कोई शेर उनकी कुटिया में आ गया। कुन्ती शेर को देखकर भाग खड़ी हुई-जल्दबाजी में भीम एक पत्थर पर गिर पड़ा। भीमे के गिरते ही वह पत्थर टूटकर बिखर गया-उसके टुकड़े सैकड़ों फुट दूर तक फैल गये।

इसी प्रकार से कुन्ती के तीसरे पुत्र के रूप में अर्जुन का जन्म हुआ-अर्जुन राजा इन्द्र के वरदान से पैदा हुआ था इसलिये उसमें इन्द्र जैसी शक्ति थी।

रानी माद्री को भी वरदान में दो जुड़वां पुत्र नकुल और सहदेव प्राप्त हुये। इस तरह राजा पांडू पांच पुत्रों के पिता बन गये। 

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Kaurav Ke Janam Ki Kahani: Sau Putra
कौरव के जन्म की कहानी: सौ पुत्र

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Sau Putra Ke Janam Ki Kahani Mahabharat Hindi Story


दूसरी ओर गान्धारी के पेट से सौ पुत्रों ने जन्म लिया, जिनमें बड़े का नाम दुर्योधन था। इन सौ पुत्रों की कहानी बड़ी विचित्र है। 

जिस समय गान्धारी ने यह सुना कि कुन्ती मां बन गई है तो ईर्ष्या के मारे उसने अपना पेट पीट लिया। उस समय उसे गर्भ था, जो पीटने से मांस के टुकड़े के रूप में बाहर आ गया। गान्धारी उस मांस के लोथड़े को उठाकर बाहर फेंकने लगी तो उसी समय वेद व्यास जी प्रकट होकर बोले "गान्धारी यह तुम क्या कर रही हो?"

"जब मैं मां नहीं बन सकती तो इन मांस के टुकड़ों को रख कर क्या करूंगी उधर कुन्ती मां बन गई और मैं बांझ की बांझ रही।"

"गान्धारी, इस मांस के टुकड़े को उठाकर सौ बार धो दो। बस हर बार तुम्हें एक पुत्र प्राप्त हो जाएगा।"

इस प्रकार गान्धारी सौ पुत्रों की मां बन गई।

दुर्योधन के जन्म लेते ही आकाश पर हजारों गिद्ध मंडराने लगे थे। जंगल में गीदड़ आवाजें निकाल रहे थे। शहर के सारे कुत्ते रोने लगे।

दुर्योधन के पैदा होते समय भयंकर तूफान आये, भूकम्प आया जिसके कारण पृथ्वी कांपने लगी।


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..... Hindi Kahani Mahabharat Ki: Pandav Tatha Kaurav Ki Janam Ki Kahani  .....


Team: The Hindi Story

Mahabharat Ki Prasidh Kahani: महावीर कर्ण की जन्म कथा महाभारत


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Surya Putra Mahavir Karna Ki Janam Katha Hindi


Mahabharat Ki Prasidh Kahani: Mahavir Karna
महाभारत की प्रसिद्ध कहानी:  महावीर कर्ण 

दुवंशी यादव राजा शूरसेन की बेटी पृथा बहुत ही सुन्दर और गुणवान थी। उसने बचपन में महर्षि दुर्वासा की सेवा करके वर पाया था  वर में उसे एक वंशीकरण मंत्र मिल गया था।

इस मंत्र में यह शक्ति थी कि पृथा जिस भी देवता को चाहेगी उसे अपने बस कर लेगी। इस मंत्र की शक्ति से उसे अपने पास बुला लेगी।

दुर्वासा जी से पृथा, जो बाद में (कुन्ती) नाम से प्रसिद्ध हुई, इस मंत्र को पाकर बहुत प्रसन्न हुई।

एक दिन! सुबह के समय जैसे ही सूर्य उदय हो रहा था। पृथा को उसका यह दृश्य बहुत ही अच्छा लगा, लाल सुर्ख गोल चेहरा देखकर इतनी मुग्ध हो गई कि खुशी से नाचते हुये सूर्य की ओर एकटक देखती रही।


फिर पृथा ने सोचा कि क्यों न मैं वशीकरण मंत्र की शक्ति से सूर्य को अपने पास बुला लूं। इससे मंत्र की शक्ति का भी पता चल जायेगा और मैं सूर्य को भी अपने पास बुलाकर उसे दिल भर... ।

बस फिर क्या था! पृथा ने उसी समय वशीकरण मंत्र का पाठ किया। सूर्यदेव अपना देव रूप धारण कर पृथ्वी पर उतरे और पृथा के पास आकर बोले “सुन्दरी! तुमने हमें प्यार से याद किया, तुम जीत गई हो, हम हारकर तुम्हारे वश में होकर चले आये हैं।" 

"यह तो मेरा सौभाग्य है कि आप जैसे महान देवता और विश्व के सर्वाधिक शक्तिमान प्रभु से भेंट हुई। आओ देवराज...आओ, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो।"


सूर्य देवता, जो उस समय शीतल पूर्ण मानव के रूप में थे, पृथा के प्यार के आगे बेबस से हो गये। बस उसके प्यार की डोरी में बंधकर वहीं पर लेट गये। प्यार ही प्यार का भूखा होता है।

दोनों ने अपने प्यार में अंधे होकर अपने शरीर एक दूसरे की बांहों में भरकर जीवन का आनन्द लिया।


किन्तु जैसे ही उनकी भावनायें शांत हुईं तो पृथा को अपनी भूल का अहसास हुआ कि वह तो समाज की नजरों में अभी तक कुंवारी है, यदि वह मां बनेगी तो लोग उसे क्या कहेंगे?

“सूर्यदेव आप तो मेरे पति हो गये किन्तु यह बात इस संसार को तो नहीं पता और न ही इस पर कोई विश्वास करेगा...फिर मेरा क्या होगा?"

"देखो पृथा, तुम्हारे पेट में जन्म लेने वाला पुत्र मेरी भाति ही महावीर होगा। उसके कानों में मेरे महाशक्ति वाले दो कुण्डल होंगे। वह महाविजेता होगा। उसे कोई भी हरा नहीं पायेगा, क्योंकि उसके शरीर में सूर्य शक्ति होगी।"

“किन्तु भगवान, मुझे अब लोग कुंवारी मां कहेंगे, कलंकनी कहेंगे, फिर मैं उन्हें क्या उत्तर दूंगी?"

“मेरे यह कानों के कुण्डल तुम उस बच्चे के कानों में डालकर उसे किसी भी नदी में डाल देना। मैं उसकी स्वयं रक्षा करूंगा। तुम कुंवारी भी रहोगी और हमारा बेटा भी बचा रहेगा।” इतना कहकर सूर्यदेव वहां से लुप्त हो गये।

✥✥✥

कुछ समय पश्चात् जैसे ही पृथा के पेट से बेटे ने जन्म लिया तो कुन्ती (पृथा) ने उसके कानों में सूर्य कुण्डल डाल दिये। फिर अपनी एक दासी की सहायता से बक्से में बन्द करके उसे नदी में बहा दिया।

वह सन्दूक अश्व नदी में बहता हुआ, यमुना नदी में पहुंचा, फिर यमुना नदी से गंगा जी में चला गया। वहां से सूत राज्य में पहुंचा।

एक स्थान पर धृतराष्ट्र के परम मित्र अधीरथ अपनी पत्नी के साथ गंगा किनारे बैठे थे कि उनकी नजर इस विचित्र सन्दूक पर पड़ी जो गंगाजी में बहता चला आ रहा था।

राजा अधीरथ ने उस सन्दूक को बाहर निकाला और उसे खोलकर देखा तो उसमें जो बालक था उसके चेहरे पर तप का एक ऐसा प्रकाश था जिसके सामने बड़े-बड़े वीरों की नजरें झुक जाती।


दोनों पति-पत्नी ऐसे तेजस्वी बालक को पाकर बहुत खुश हुये। उन्होंने उस बच्चे को अपने घर ले जाकर उसका पालन-पोषण आरम्भ कर दिया। ब्राह्मणों को बुलाकर उसका नामकर्ण संस्कार किया गया तो सब ने एक मत होकर उसका नाम कर्ण रख दिया।


जैसे ही कर्ण बड़ा हुआ तो पिता अधीरथ ने उसे शस्त्र विद्या सिखाने के लिये द्रोणाचार्य, कृपाचार्य व परशुराम के पास भेजा । सब गुरुओं से शस्त्र विद्या सीखकर ही तो वह महावीर कर्ण बना। सूर्य शक्ति तो पहले से ही उसके अन्दर थी, फिर उसे द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, परशुराम जैसे महागुरु मिल गये तो वही शक्ति कई गुना बढ़ गई।

✥✥✥

थोड़े समय के पश्चात् पृथा 'कुन्ती' की शादी की तैयारियां आरम्भ हो गईं। राजा कुन्ती भोज ने उसका स्वयंवर रचा जिसमें सारे देशों के राजाओं-महाराजाओं को निमन्त्रण दिये गये।

उसी स्वयंवर में देव तुल्य पांडु भी आये हुये थे। कुन्ती बारी-बारी से सब राजाओं के पास से होती हुई पांडू राजा के पास जाकर रुकी और फिर प्यार से उनकी ओर देखते हुये उनके गले में वर-माला डाल दी।


सारे राजाओं ने आश्चर्य से पांडू राजा की ओर देखा, उनको यह समझ में नहीं आ रहा था कि कुन्ती ने इस राजा में कौन-सी ऐसी विशेषता देखी कि इतने राजाओं को छोड़कर उसी के गले में वर माला डाली।

इसे संयोग ही कहा जायेगा।

पांडू राजा अपनी पत्नी को लेकर हस्तिनापुर पहुंचे तो उन सबका भव्य स्वागत किया गया। अपने नये जीवन में पांडू बहुत खुश थे। भीष्म जी जैसे महान वीर भाई के साये में सब भाई नई-नई बातें सीख रहे थे।

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..... Mahabharat Ki Prasidh Kahani: Mahavir Karna Janam Katha .....


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Mahabharat Dhritarashtra Vivah | धृतराष्ट्र का विवाह अंधी बहु


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Mahabharat Dhritarashtra Ke Vivah Ki Katha Kahani

Mahabharat Dhritarashtra Ka Vivah: Andhi Bahu
महाभारत धृतराष्ट्र का विवाह: अंधी बहु 

जैसे ही प्रजा को पता चला कि महाराज शान्तनु का वंश नष्ट होने से बच गया है। अब उनके तीन राजकुमार धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा महान ज्ञानी विदुर जी मिलकर देश का शासन चलायेंगे तो सारी प्रजा खुशी से नाचने लगी, पूरे देश में कई दिन तक खुशियां मनाई गईं।


उघर भाई भीष्म ने अपने तीनों भाईयों को बड़े लाड़-प्यार से पाला, उनकी शिक्षा-दीक्षा तो महान विद्वान व्यास जी से अधिक कौन कर सकता था, किन्तु मां और भीष्म के लिये सबसे दुःख की बात तो धृतराष्ट्र का अन्धा पैदा होना था। 

इसका कारण माता अम्बिका स्वयं थी। क्योंकि उसे व्यास जी की शक्ल से घृणा थी। जिस समय वह व्यास के साथ स्पर्श कर रही थी, उसने आंखें बन्द की ली थीं। उसका फल यह निकला कि उसके पेट से जन्म लेने वाली सन्तान की आंखें बन्द हो गई, धृतराष्ट्र मां के पेट से ही अन्धे पैदा हुये, जिसका प्रभाव उसके नैतिक जीवन पर अधिक पड़ा था। 

किन्तु फिर भी भाई भीष्म ने अपने अंधे भाई को सीने से लगाया और उसका विवाह कंधार के महाराज सुबल की पुत्री कन्धारी से कर दिया।

रूप सुन्दरी कन्धारी ने अपने पति को अंधा देखकर स्वयं भी सारी आयु आंखों पर पट्टी बांधकर अंधों की भाति जीवन व्यतीत करने की प्रतिज्ञा कर ली, उसने पतिव्रतधर्म का पालन करने के लिये जीवन ही हर खुशी को त्याग दिया।


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..... Mahabharat Dhritarashtra Ka Vivah: Andhi Bahu .....


Team: The Hindi Story

Mahabharat: धृतराष्ट्र और विदुर जी की जन्म कहानी | Vyas Putra Kahani


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Vyas Ke Putra Dhritarashtra Pandav Aur Vidura Ki Janam Katha Mahabharat


Mahabharat: Dhritarashtra Aur Vidura Ji Ki Janam Ki Kahani
महाभारत: धृतराष्ट्र और विदुर जी की जन्म की कहानी

त्यवती महलों में रानी बनकर आई तो राजा शान्तनु अपने दुःखों को किसी सीमा तक भूल गये थे। फिर कुछ समय पश्चात् ही जब सत्यवती की कोख से एक-एक करके दो बेटे पैदा हुये तो सारे घर का वातावरण ही बदल गया था।


इनमें से एक का नाम चित्रांगद और दूसरे का नाम विचित्रवीर्य रखा गया। जब दोनों भाई जवान हुये तो राजा शान्तनु परलोक सिधार गये।


माता सत्यवती की आज्ञा से भीष्म ने चित्रांगद को राजगद्दी पर बैठाकर देश का राजा बना दिया।

राजा शान्तनु अपने समय के महावीर माने गये थे, उनके जीवित होते किसी छोटे-मोटे राजा में यह हिम्मत कहां थी जो उनके देश की ओर देख भी सकता-किन्तु जैसे ही चित्रांगद राजगद्दी पर बैठा तो पड़ोसी राजा गन्धर्व राज ने उनके देश पर आक्रमण कर दिया।"


चित्रांगद की उस राजा से कुरुक्षेत्र के मैदान में तीन वर्ष तक निरन्तर लड़ाई चलती रही। दोनों राजा इतने बहादुर थे कि लड़ाई का निर्णय होना कठिन हो रहा था। अन्त में शान्तनु पुत्र चित्रांगद युद्ध में शहीद हो गया। उसकी मृत्यु के पश्चात् भीष्म ने विचित्रवीर्य को राजगद्दी पर बैठाया।


विचित्रवीर्य की आयु उस समय कम थी-किन्तु फिर भी भीष्म की इच्छा थी की उसकी शादी जल्दी हो जाये। क्योंकि उन्होंने स्वयं तो सारी आयु शादी न करने की प्रतिज्ञा कर रखी थी।


उन दिनों काशी नरेश ने अपनी तीन लड़कियों (राजकुमारियों) का स्वयंवर रचाया। उनके नाम थे अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका। माता सत्यवती को साथ ले भीष्म अकेले ही रथ पर काशी जी जा पहुंचे।


सभा आरम्भ होते ही सब राजाओं से उन कन्याओं परिचय करवाया गया तो जैसे ही भीष्म की बारी आई तो लड़कियों ने उसका बुढ़ापा और सफेद बाल देखकर नाक चढ़ा ली। और मन ही मन में सोचने लगी कि कहीं इस खूसट से शादी न करनी पड़ जाये।


उधर बाकी राजा लोगों ने जब भीष्म की आयु देखी और उनकी प्रतिज्ञा का पता चला तो सबके सब उन पर व्यंग करते हुये हंसने लगे।


भीष्म अपना यह अपमान सहन न कर पाये। महाबली वे थे ही। उनके लिये यह कठिन नहीं था कि वे तीनों कन्याओं को उठाकर अपने रथ में डालकर हस्तिनापुर ले जाते। अपने अपमान का बदला लेने का एकमात्र मार्ग यही था।


क्रोध से भरे भीष्म ने उसी समय तीनों कन्याओं को उठाकर अपने रथ में डालते हुये कहा “आओ, जिसने अपनी मां का दूध पीया है-यदि उसमें हिम्मत है तो छुड़वा ले इन कन्याओं को-इन्हें अब मैं ले जा रहा हूं-तुम सब मिलकर मेरा मजाक उड़ा रहे थे न-जब आओ मेरी तलवार के सामने।"


सारे राजा भीष्म की शक्ति देखकर पीछे हट गये। अब उनमें से किसी में भी हिम्मत नहीं थी कि वह भीष्म की तलवार के सामने आते।


भीष्म को तो देवताओं की शक्ति का वरदान मिला हुआ था। बस फिर क्या था! भीष्म उन तीनों कन्याओं को रथ में बैठाकर हस्तिनापुर ले गये। उसी समय...विचित्रवीर्य के विवाह की तैयारियां होने लगीं। 


उधर-काशी नरेश की बेटी कन्या अम्बा ने कहा “राजन! मैं तो मन ही मन में पहले से ही राजा शाल्व को अपना पति मान चुकी हूं-आप तो धर्मात्मा हैं-आप कृपा करके मुझे अपने पति के पास भेज दीजिये।"


भीष्म जी ने उसी समय अम्बा को पूर्ण प्रतिष्ठा, आदर देते हुये राजा शाल्व के पास भेज दिया-शेष दोनों लड़कियों की शादी विचित्रवीर्य से कर दी।


अब वह दोनों रानियां बनकर उन महलों में राज करने लगी। 

भाग्य को तो शायद भीष्म की यह खुशियां अच्छी ने लगी थीं। शादी के थोड़े समय पश्चात ही विचित्रवीर्य की अचानक ही मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु से सारे राज्य पर चिंता के बादल छा गये-क्योंकि विचित्रवीर्य के घर में कोई सन्तान नहीं थी।

अब सबके सामने यह प्रश्न था कि इस देश की राजगद्दी का वारिस कौन होगा? क्या शान्तनु वंश का अन्त हो जायेगा?


यही चिन्ता सबके सामने थी-जो अन्दर ही अन्दर दीमक की तरह खाये जा रही थी। किन्तु इसका कोई उपाय किसी को भी समझ में नहीं आ रहा था।


कुछ समय तो ऐसे ही बीत गया। शान्तनु वंश की गद्दी खाली पड़ी रही तो एक दिन रानी सत्यवती ने दुःखी होकर भीष्म जी से कहा

"बेटे, हमारे जीवन में और क्या रखा है-देखो आपके पिता की गद्दी खाली पड़ी है-अब तो तुम्हें ही इसे सम्भालना होगा-अब काशी नरेश की दोनों कन्याओं को तुम्ही स्वीकार करके इनसे सन्तान पैदा करो-ताकि शान्तनु वंश का कहीं नाश न हो जाये।"


"मां, आप तो जानती हैं कि मैंने आपकी शादी से पूर्व यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं सारी आयु कुंवारा रहूंगा-मैं राजगद्दी पर नहीं बैठूगा। मैं भीष्म हूं-भले ही सारा संसार बदल जाए मगर मैं अपनी प्रतिज्ञा को भंग नहीं कर सकता।"


भीष्म का दृढ़ निश्चय देखकर माता सत्यवती चुप होकर चली गईं। अब उसकी आंखों के सामने अन्धेरा ही अन्धेरा था। चिन्ता, दुख।

वह करें भी तो क्या करें? समय व्यतीत हो रहा था। सत्यवती की चिन्ता बढ़ रही थी। एक दिन-जैसे सत्यवती के अन्दर सोई हुई औरत जाग उठी हो। उसने प्रतिज्ञा कर ली कि मैं अपने वंश को बचाने के लिये बड़ी से बड़ी कुर्बानी करने के लिये तैयार हूं।

हां-हां-जो राज इंतने वर्षों से उसके सीने में दबा पड़ा था-उस राज को उगल देना होगा।


इसी से उसका वंश बच सकता है-यही एकमात्र मार्ग बाकी रह गया है यही निर्णय कर सत्यवती भीष्म के पास गई।


"मां...आप और इस समय? इस चिन्ता की हालत में? क्या मैं आपके इस कष्ट का कारण जान सकता हूं?"


"बेटा भीष्म, आज मैं यह निर्णय करके आई हूं कि इस वंश को बचाने के लिए मैं वह भेद भी तुम्हें बताकर रहूंगी जिसे मैंने संसार से छुपाकर रखा था।"


"मां-आप तो वैसे भी सत्यवती हो। यदि आप ही सत्य नहीं बोलोगी तो और कौन बोलेगा? फिर इस समय तो हमारा पूरा वंश नष्ट हो रहा है। यदि अब भी हमने साहस से काम न लिया, तो फिर हमारे विनाश को कोई नहीं रोक सकता।"


"बेटा भीष्म, तुम्हारा जैसा बेटा तो इस संसार में शायद ही कहीं पैदा हो-तुम्हारे त्याग और तप ने तो आज मुझमें भी साहस पैदा कर दिया है, इसलिये आज मैं तुमसे कुछ भी नहीं छुपाऊंगी।"


“कहो मां! आज जो आपके मन में है, उसे कह डालें। इसे कहने से तो आपकी आत्मा का बोझ ही हल्का होगा।"


"बेटा विवाह से पहले की बात है। जब मैं यमुना नदी पर अपने पिता केवटराज की नौका को चलाया करती थी-उस समय मेरे शरीर में से मछली जैसी दुर्गन्ध आया करती थी।


एक दिन नौका पार करने हेतु पराशर मुनि उसमें बैठ गए। मुनि ने मेरे रूप-यौवन पर मोहित होकर मुझे बीच नदी में ही घूरना शुरू किया। मैं उस समय डर गई। किन्तु सामने मुनि बैठे थे-इसलिये ऐसे अवसर पर उनसे क्या कह सकती? जिसका डर था-वही हुआ।


मुनि पराशर अपनी भावनाओं पर काबू न रख सके। उन्होंने मुझे अपने बाजुओं में भरकर मुझसे शारीरिक सम्बन्ध बना लिये।

उन्होंने अपनी भावनाओं की आग को तो ठण्डा कर ही लिया था। मैं मुनि के शाप के डर से अपना सब कुछ उनको अर्पण करने पर मजबूर हो गई। मेरे शरीर से दुर्गन्ध दूर हो गई और उसके स्थान पर सुगन्ध फैल गई थी। मेरा शरीर बदल गया। जीवन बदल गया।

ठीक नौ माह के पश्चात् मैंने एक पुत्र को जन्म दिया-यमुना नदी के बीच उसकी उपज हुई थी-इसलिये उसका नाम दुपायन रखा गया।

वह मुनि की सन्तान होने के कारण महाज्ञानी, विद्वान सिद्ध हुआ। उसने वेदों का ज्ञान लिया-उन्हें चारों भागों में बांटकर अपना नाम संसार में फैलाया -तभी उसका नाम वेद व्यास पड़ा।

उसमें ऐसी महाशक्ति है कि वह हर काम पूरा कर सकता है, यदि तुम कहो तो मैं उसे यहाँ बुलाऊं-हो सकता है कि वह हमारी सन्तान की इच्छा पूरी करके हमारे वंश को मिटने से बचा ले।"

"मां, यदि आप चाहो तो ऐसा कर सकती हो। मैं अपने वंश को बचाने के लिये हर कार्य करने को तैयार हूं।"


"ठीक है बेटे! मैं अभी व्यास बेटे को बुलाती हूं।" उसी समय सत्यवती ने अपने बेटे को सच्चे मन से याद किया। कुछ ही क्षणों में व्यास जी हवा में उड़ते हुये अपनी मां के सामने हाथ जोड़े खड़े प्रणाम कर रहे थे।

"मां...आप किस कष्ट में हो, जो आज अपने पुत्र को याद किया?"

"बेटे, यह तेरे भाई भीष्म हैं जिन्होंने जीवन भर कुंवारे रहने और राजगद्दी पर न बैठने की सौगन्ध केवल मेरी सन्तान के लिये खा रखी है। किन्तु मेरा यह दुर्भाग्य है कि मेरे दोनों बेटे युद्ध में मारे गये, उनकी दोनों युवा पत्नियां सन्तान से वंचित रह गईं। यदि इस समय में वे मां न बनीं तो हमारा सारा वंश समाप्त हो जायेगा।"

सत्यवती अपने आंसुओं को साफ करते हुए आपने बेटे व्यास जी से बोली।


"मां जी, आप चिन्ता क्यों करती हैं? अपने बेटे पर विश्वास रखो। प्रभु का ध्यान करो। मैं इन्हें पुत्र अवश्य दूंगा। मैं अपने वंश का नाश नहीं होने दूंगा। आखिर मैं आपका बेटा हूं।"


व्यास जी कुछ दिनों के लिये महलों में ही रुक गये। अब अम्बिका और अम्बालिका दोनों ही व्यास जी के साथ रह रही थीं।


सन्तान की प्राप्ति के लिये जैसे ही एक रात अम्बिका व्यास जी के साथ आनन्द ले रही थी तो प्यार से मुग्ध उसने अपनी आंखें बन्द कर लीं-क्योंकि व्यास जी की लम्बी दाढी उन्हें पसन्द नहीं थी।


अम्बालिका ने ऐसा नहीं किया-उसे व्यास जी देवता नजर आ रहे थे। उनकी लम्बी दाढ़ी और बड़ी-बड़ी मूंछों के पीछे एक महान तपस्वी, ज्ञानी, बुद्धिमान, त्यागी इन्सान के रूप में देवता छुपा हुआ था।


समय व्यतीत हो रहा था।


रानी सत्यवती को अब पूर्ण आशा हो गई थी कि उसकी दोनों बहुएं मां बनने वाली हैं। अब इनका वंश मिटने से बच जायेगा।


व्यास जी भाई भीष्म के साथ मिलकर सारे राजकाज के काम चलाने लगे। यह तो एक बड़ी विचित्र बात थी कि ऋषि होते हुए व्यास जी महलों में आनन्द ले रहे थे।

अम्बिका को व्यास जी का वह कुरूप दाढ़ी वाला चेहरा बिल्कुल पसन्द नहीं था। वह मन से उनके साथ कोई भी शारीरिक सम्बन्ध नहीं रखना चाहती थी। यही कारण था कि वह कभी-कभार अपने को उनसे दूर रखने के लिये अपने पलंग पर अपनी हमशक्ल दासी को लिटाकर चली जाती थी।


एक बार व्यास जी जैसे ही अम्बिका के बिस्तर पर पहुंचे-अम्बिका को तो पता था अब वह मां बनने वाली है-अब उसे दाढ़ी वाले साधु के पास नहीं जाना-उसने अपने स्थान पर अपनी दासी को लिटा दिया।


जिसका परिणाम यह हुआ कि व्यास जी ने अंधेरे में उसे अपनी पत्नी समझकर प्यार किया।

इतिहास में यह दासी प्रेम और स्पर्श, महान तपस्वी और ज्ञानी भक्त विदुर जी के रूप में प्रकट हुये-जो महात्मा मांडण्य के शाप से धर्मराज ही विदुर जी का रूप धारण करके पृथ्वी पर आये थे।

अम्बालिका के पेट से पांडव पुत्र ने जन्म लिया। अम्बिका के पेट से धृष्तराष्ट्र ने जन्म लिया।

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..... Mahabharat Kahani: Dhritarashtra Pandav Aur Vidura Ji Ki Janam Ki Kahani .....


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Mahabharat Kahani Hindi: राजा शान्तनु और सत्यवती महाभारत कहानी


Mahabharat Kahani Hindi: Raja Shantanu Aur Satyavati
महाभारत कहानी हिंदी: राजा शान्तनु और सत्यवती

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Raja Shantanu Aur Satyavati Ka ViVah Ki  Mahabharat Story Hindi

राजा शान्तनु का मन इस संसार से ही विरक्त हो चुका था...अपनी पत्नी और सन्तान के दुःख ने उन्हें जैसे पागल ही कर दिया था। उनके जीवन में कोई खुशी नहीं रही थी...कोई आशा नहीं थी। बस हर समय बैठे अपनी पत्नी गंगे और आठों पुत्रों के बारे में सोचा करते थे। सब कुछ ही तो लुट गया था। सब चला गया था। अब तो उसकी यादें ही बाकी रह गई थीं। गंगा से उन्हें कितना प्यार हो गया था! अब तो यह जीवन ही सूना हो गया है।


इतने में राजा ने देखा कि एक युवक अपने बाणों से गंगाजल को हजारों फुट ऊंचा उठा रहा है। उसके बाणों में इतनी महान शक्ति देख राजा शान्तनु स्वयं ही हैरान थे। ऐसी महान शक्ति तो बड़े-बड़े वीरों में भी नहीं होती...किन्तु यह युवक... । राजा शान्तनु आश्चर्य से उस युवक की ओर देखते हुये पूछने लगे "हे वीर युवक! तुम कौन हो?"


इससे पहले कि वह युवक कुछ कहता...उसी समय पवित्र गंगा स्त्री का रूप धारण करके, उस युवक का हाथ पकड़कर खड़ी हो गई और हंसते हुये राजा की ओर देखते हुये बोली-“क्यों राजन, आपने पहचाना हमें?"


"हे गंगे! भला मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूं...तुम मेरे ही शरीर का एक अंग हो। तुम्हारे बिना तो राजा शान्तनु अधूरा है। जब से तुम हमारे जीवन से गयी...हमारा तो सब कुछ चला गया प्रिया।"


"हे मानव श्रेष्ठ ! मैं तुम्हारे दुःख को भली-भांति जानती हूं. इसीलिये तो इस बालक को स्वयं तुम्हारे पास लेकर आई हूं।

यह हमारा आठवां बच्चा है...इसका नाम मैंने 'देवव्रत' रखा है। 

इसने दुर्वासा जी से छः अंगों सहित वेदों को असुर गुरु शुक्राचार्य व बृहस्पति से सभी प्रकार की विद्याओं व शास्त्रों को तथा परशुराम जी से सारी शस्त्र विद्याओं को सीखकर निपुणता ग्रहण कर ली है।


यह इतना बड़ा महावीर बन चुका है कि बड़े से बड़ा वीर भी इसके सामने नहीं ठहर सकेगा।"


"प्रिया गंगे क्या... मैं...।"


"अब मैं वही मां गंगे हूं। अब मुझे भूल जाओ। तुम्हारे दुःख देखकर ही मैं इसे लेकर आई हूं...यह तुम्हारे और मेरे प्यार की अमर निशानी है।"

"गंगे..." 

गंगे वहां से जा चुकी थी। उसी समय राजा शान्तनु ने आगे बढ़कर अपने बेटे को छाती से लगाकर प्यार किया। उस बेटे में राजा शान्तनु को गंगा की तस्वीर नजर आ रही थी। यही देवव्रत...। महाभारत का नायक भीष्म पितामह बना।

✥✥✥

एक बार फिर राजा शान्तनु शिकार खेलते हुये यमुना तट पर पहुंच गये। वहां पर फिर एक सुन्दर कन्या खड़ी अपने शरीर को हवा में झुलाती हुई नृत्य कर रही थी।


शान्तनु का चंचल मन उस सुन्दरी को देखकर व्याकुल हो उठा। और उनके सारे शरीर से चिंगारियां सी निकलने लगीं।

ठण्डी आह भरते हुए राजा शान्तनु उस सुन्दर कन्या के पास गया...और फिर उसकी ओर प्यार भरी दृष्टि से देखते हुए पूछने लगा...

"हे देव सुन्दरी...तुम कौन हो?" 'मेरा नाम सत्यवती है...मैं केवटराज दाशराज की पुत्री हूं...और आप?"

“मैं इस देश का राजा शान्तनु हूं...सत्य बात तो यह है कि तुम्हें देखते ही मेरा मन चंचल हो उठा है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि तुम मेरी रानी बन जाओ। मेरे सूने महल आप जैसी सुन्दरी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।"


“राजन ! मुझे खुशी है कि आप मुझे पसन्द करते हो-किन्तु यह बात तो आप जानते ही हैं कि मेरी शादी का निर्णय मेरे पिता राजा केवटराज दाशराज ही करेंगे। इसलिये आपको उन से ही आज्ञा लेनी होगी।"


"ठीक है, मैं कल ही उनकी सेवा में हाजिर होऊंगा।" यह कहते हुये राजा वहां से चला गया।

सत्यवती अपने होने वाले पति को जाते हुए देखती ही रह गई। 

✥✥✥

देवव्रत की भीष्म पितामह बनने की कहानी | Devrat Ki Bhishma Pitamah Banane Ki Kahani

दूसरे दिन सुबह ही राजा शान्तनु अपना रथ लेकर केवटराज के पास पहुंच गया और उनके सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि आप मेरी शादी अपनी बेटी सत्यवती से कर दीजिये।


“राजा शान्तनु, हम आपको अच्छी तरह जानते हैं। हमें यह भी पता है कि इससे पूर्व भी अपकी एक सन्तान है।"


“जी हां-है।" "राजन ! हम आपसे अपनी पुत्री की शादी एक शर्त पर करने के लिये तैयार हैं।" "कौन-सी शर्त है महाराज ?"


“यही कि आपके राज्य की राज गद्दी का वारिस केवल हमारी बेटी के पेट से पैदा होने वाला लड़का ही होगा। बोलो मन्जूर है हमारी यह शर्त ?"


राजा शांतनु ऐसी शर्त सुनते ही शांत हो गये। उनके चेहरे का रंग पीला पड़ गया। उनकी आंखों के सामने अपने बेटे देवव्रत की शक्ल घूमने लगी। शान्तनु उस समय कुछ भी न बोले और चुपचाप घर वापस आ गये। राजा की हालत देखकर ऐसा लगता था-जैसे वे बहुत दिनों से बीमार हों। रंग पीला पड़ गया था, चेहरा उदास, होठों पर पपड़ियां जमी हुई। 

जब देवव्रत ने अपने पिता की यह हालत देखी तो वह एकदम तड़प कर बोला"पिताजी! आपको क्या हुआ ?" "बेटा, यह मत पूछो कि मुझे क्या हुआ। जो हुआ वही अपना भाग्य था-उसे भूलने में ही लाभ होगा।"

"नहीं पिताजी-मैं आपका बेटा हूं-मां ने मुझे यही शिक्षा देकर भेजा है कि आपके दुःख-सुख का ख्याल रखू-क्या आप मुझे भी अपने दुःख का कारण नहीं बतायेंगे?"


"बेटे देव ! हम और सब कुछ सहन कर सकते हैं किन्तु तुम्हारा अधिकार किसी दूसरे को दे देने वाली बात तो हमारी कल्पना में भी नहीं आ सकती।"

"पिताजी, आप जो कुछ कहना चाहते हो एकदम साफ-साफ कहो।"

"बेटे....हम केवटराज की कन्या से विवाह करना चाहते हैं-किन्तु उस राजा ने हमारे सामने एक ऐसी शर्त रख दी जिसे हम मन्जूर नहीं कर सकते थे।"

"कैसी शर्त ?"

“यही कि हमारे राज्य की राजगद्दी का वारिस देवव्रत नहीं बल्कि उनकी बेटी का बेटा होगा-अन्यथा यह शादी नहीं होगी।"

"पिताजी! यह तो बहुत छोटी-सी बात है।" "तुम्हारे लिये छोटी है बेटे-इस दुनिया के लिये नहीं।"

"दुनिया तो हम बनाते हैं पिताजी। हम राजा हैं। हमें अपने फैसले करने का पूरा अधिकार है। अब आप यह बात मुझ पर छोड़ दीजिये कि मैं क्या करने जा रहा हूं।"


यह कहकर देवव्रत वहां से निकल गया। "बेटे देवव्रत! रुक जाओ-रुक जाओ।" देवव्रत ने पिता की एक भी बात न सुनी। वह वहां से सीधा केवटराज के पास गया और उनसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा।


"देखो महाराज! मैं राजा शान्तनु का बेटा हूं और आपके पास यह वचन देने आया हूं कि यदि आप अपनी पुत्री की शादी मेरे पिता से कर देंगे तो राजगद्दी का मालिक केवल वही राजकुमार होगा जिसे आपकी बेटी जन्म देगी-मैं अपने आपको राजसिंहासन से अलग करता हूं।"


उस युवक की यह प्रतिज्ञा सुनकर केवटराज दाशराज बड़े खुश हुए। उन्होंने उसी समय अपनी बेटी को रथ में बैठाकर देवव्रत के साथ ही भेज दिया।


जैसे ही देवव्रत सत्यवती को लेकर महलों में आया तो राज शान्तनु उसे देखकर हैरान रह गये थे।


"पिताजी, मैंने आपकी इच्छा पूर्ण करने के लिये अपना सब कुछ त्याग दिया है-और मां को साथ ही ले आया हूं।"


"बेटे-तुमने यह क्या किया? इस राजगद्दी पर तो तुम्हारा ही अधिकार था-यह अन्याय होगा।"


"पिताजी! अपनी खुशी से त्याग करना अन्याय नहीं होता! आप तो मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैंने अपने कर्तव्य का पालन किया है।"


"बेटे...मैं तुम्हें यही आशीर्वाद देता हूं कि तुम जब तक भी इस संसार में जीना चाहोगे तब तक ही जीवित रहोगे-तुम केवल अपनी इच्छा से मरोगे।

इतिहास में तुम भीष्म पितामह के रूप में जाने जाओगे-तुम्हारा यह त्याग ही तुम्हें अमर कर देगा।"

यह कहते हुये राजा शान्तनु ने अपने बेटे को सीने से लगा लिया। दोनों की आंखों से आंसू निकल रहे थे। सत्यवती भी मूर्तिवत् देवव्रत की ओर बड़े प्यार से देख रही थी।

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..... Mahabharat Kahani Hindi: Raja Shantanu Aur Satyavati .....


Team: The Hindi Story

Mahabharat Ki Hindi Kahani: राजा शान्तनु और गंगा महाभारत कहानी

Mahabharat Ki Hindi Kahani: Raja Shantanu Aur Ganga Ji
महाभारत की हिंदी कहानी:  महाराजा शान्तनु और गंगा जी

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Raja Shantanu Aur Ganga Ji Ki Hindi Kahani Mahabharat


 महाराजा शान्तनु और भीष्म पितामह 

राजा शान्तनु!

अपने समय के महावीर योद्धा और अपनी सत्यवादिता, दानशीलता और तपस्या शक्ति के कारण देवताओं के महाधिपति इन्द्र के तुल्य तेजस्वी एवं यशस्वी थे।


इनका राज्य अति विशाल था-प्रजा बहुत सुखी थी और अपने राजा को भगवान समझकर पूजती थी।


एक बार...!


महाराजा शान्तनु जंगल में शिकार खेलने गये तो किसी मृग का पीछा करते-करते दूर गंगा के तट पर निकल गये। गंगा का पवित्र और शुद्ध जल, ठण्डी-ठण्डी हवायें, चारों ओर खिले हुये फूल।


आहा...कितना आनन्द है इस स्थान पर! कितनी शान्ति है! चारों ओर से फूलों की महक आ रही है। कुछ देर के लिये राजा शान्तनु गंगा किनारे उस हरी-हरी घास पर बैठकर आनन्द लेने लगे। उनका मन मस्ती में नाच रहा था।


थोड़ी देर में इन फूलों में से राजा शान्तनु ने एक सुन्दरी को निकलते देखा। बस उस महान सुन्दरी को देखते ही राजा शान्तनु देखते ही रह गये। उनके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। आंखें उसके गोरे शरीर से अलग न हो सकीं।


ऐसी सुन्दरी तो उन्होंने पहली बार देखी थी-उसके शरीर का हर अंग एक नशा था। शान्तनु देखते ही रह गये-ऐसा प्रतीत होता था कि वह पत्थर के बन गये हो। “सुन्दरी ! तुम देव, दानव, यक्ष आदि में से किसकी कन्या हो?" 


"हा-हा-हा।" वह सुन्दरी राजा की ओर देखकर जोर-जोर से हंसने लगी-जैसे उसने कोई अनहोनी बात कह दी हो।


इस हंसी के साथ ही उसके शरीर का अंग-अंग हिलने लगा था-उसके हर अंग में से एक नशा टपक रहा था-मस्ती में झूमती हुई वह नाचने लगी थी।


"तुम मेरी बात का उत्तर नहीं दोगी, रूप सुन्दरी?" राजा उसके निकट चले गये।


"क्या चाहते हो तुम?" सुन्दरी के होठों से यह शब्द निकले तो राजा शान्तनु ने महसूस किया जैसे हजारों फूल टूटकर उनकी झोली में आ गिरे हों। ,


"मैं यदि तुम्हें अपनी पत्नी बना लूं तो...?" 

"तो क्या होगा महाराज?" 

वह सुन्दरी भी राजा शान्तनु के सुन्दर और बहादुर शरीर को देखकर मोहित हो गई थी-किन्तु फिर भी उसने अपने आप पर काबू पा ही लिया-जैसे राजा के जवाब की प्रतीक्षा कर रही हो।


"रूपवती" 

"हां महाराज!" 

"तुम बहुत सुन्दर हो और मुझे बहुत प्यारी लगती हो।" 

"फिर-?"


सुन्दरी ने राजा शान्तनु की आँखों में आँखे डालते हुए बड़े अन्दाज से उनकी ओर देखा। वह तो अपना दिल इस युवक को दे ही बैठी थी-किन्तु फिर भी अपने मन की बात राजा के मुंह से सुनना चाहती थी। 

उसे पता था राजा उस पर मोहित हो चुका है 

"मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं देवरानी! तुम्हारी सुन्दरता, तुम्हारा प्यार यदि मुझे मिल जाये तो मेरा जीवन सफल हो जाये।"


“राजनः मैं आपकी व्याकुलता को भली-भांति समझ रही हूं। तुम्हारी आंखों में जो स्नेह है-उसे मैं भूल नहीं सकती, किन्तु यदि आप मुझसे शादी करना चाहते हैं तो आपको मेरी कुछ शर्तों को मानना अनिवार्य होगा।"


“सुन्दरी, मैं राजा शान्तनु हूं...मैं तुम्हारी हर शर्त मानने को तैयार हूं...बस एक बार इन प्यार भरे होठों से मुझे यह कह दो कि मैं तुम्हारा हाथ सदा के लिये अपने हाथों में ले लूंगी।"


"राजन, मैं आपकी हो सकती हूं...मैं आपके प्यार को प्यार दे सकती हूं... किन्तु आपको भी मेरी इन शर्तों का पालन करना होगा।

(1) आप मुझसे कभी भी यह नहीं पूछोगे कि मैं कौन हूं और कहां से आई हूं...और न ही मैं आपको यह बताऊंगी।"

(2) मैं जो भी करूंगी, आप मुझे कभी रोकेंगे नहीं। मैं जहां भी ज़ाऊंगी, आप मुझसे यह नहीं पूछोगे कि मैं क्या करने जा रही हूं।

(3) आप कभी भी मुझे अप्रिय शब्द नहीं बोलेंगे।


"बस आप जब तक अपनी प्रतिज्ञा का पालन करोगे, तब तक मैं आपके साथ रहूंगी। हां, जिस दिन आप अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ दोगे, बस उसी दिन आपको छोड़कर चली जाऊंगी।"


राजा शान्तनु तो उस सुन्दरी को देखकर ही अपना सब कुछ भूल चुके थे। उनका हृदय घायल पंछी की भांति तड़प रहा था, उन्हें तो केवल यह सुन्दरी चाहिये थी। इसके लिये वे कुछ भी कुर्बान करने के लिए तैयार थे-यह शर्ते तो कोई विशेष थी ही नहीं।


उसी समय उन्होंने हंसते हुए कहा- “देखो सुन्दरी...हम अभी तुम्हें वचन देते हैं कि हम तुम्हारी इन सब शर्तों का पालन करने की प्रतिज्ञा करते हैं।"

बस-! 

उसी दिन से गंगाजी राजा शान्तनु के साथ विवाह करके उनके महलों में रहने लगीं। शान्तनु से उन्हें हार्दिक प्यार था- यह प्यार तो उस पुनर्जन्म की कहानी थी, जो शाप बन गया था।

इस कहानी को शायद शान्तनु न जानते हो किन्तु गंगाजी को तो वह दिन याद था। 


अतीत का वह दिन-!

अब महाभिषेक नामक प्रतापी राजा ने हजार अश्वमेघ यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया था।

वे देवराज इन्द्र की सभा में सब देवताओं के साथ बैठे हुये थे। उसी समय तो वह हवा के झोंके के समान उस सभा में पहुंच गई। सब देवताओं ने उठकर हाथ जोड़ते हुए कहा था

"गंगा मां की जय हो।

गंगा मां की जय हो।" 


सब लोग उसकी जय-जयकार करते हुए सिर झुकाये बैठे थे, किन्तु राजा महाभिषेक उसकी ओर प्यार भरी नजरों से देखते रहे।

उनकी नजरों से कामदेव टपक रहा था-उसकी सुन्दरता पर राजा महाभिषेक मर मिटे थे


ब्रह्मा जी ने राजा महाभिषेक को यह पाप करते देखकर शाप दिया था कि “जाओ तुम मृतलोक में जाकर जन्म लो और स्वर्ग को छोड़ कुछ दिन वहीं पर रहो।"


पृथ्वी पर आकर धर्मात्मा व तेजस्वी राजा प्रतीक के घर महाभिषेक ने जन्म लिया। गंगा स्वयं भी तो महाभिषेक पर मोहित हो चुकी थी-तभी तो वह ब्रह्मलोक छोड़कर पृथ्वीलोक में आ गई थी।


जब वह पृथ्वी लोक में आ रही थी तो रास्ते में उन्होंने आठ ‘वतुओं को पृथ्वी की ओर आते देखा।


स्वर्ग लोग से पृथ्वी की ओर आते देखकर उनके आने का कारण जब उन्होंने पूछा ! तो वे आठों उदास स्वर में बोले


“हे मां गंगे...हम लोग महर्षि दुर्वसा जी को पहचान न सके, उनको नमस्कार न करने और आदर न करने पर उन्होंने हमें यह शाप दे दिया कि-जाओ, तुम स्वर्ग से निकलकर पृथ्वी पर मानव जन्म लो।"


"मां गंगे! अब हम उस स्त्री की खोज कर रहे हैं जो हमें अपने पेट से जन्म देकर हमें वापस स्वर्ग भेज दे...हमें पता है, पृथ्वी पर हमारे पिता शान्तनु होंगे और माता...।"


"हे, मां गंगे, अब आप हमारी मां बनो और हमें जन्म देते ही मार डालना ताकि हम वापस देवलोक पहुंच जायें।"


“ठीक है देवताओं, मैं ही तुम्हारा कल्याण करूंगी-मैं तुम्हें अपने पेट से जन्म देकर वापस देवलोक भेज दूंगी।" 

और...। अब वही प्रतिज्ञा पूरी करने के लिये उसने यह रूप धारण किया।


शान्तनु नहीं जानते थे कि जिससे मैंने शादी की है-वह तो वही है, जिसके लिए उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया गया था।


उनकी भी हार्दिक इच्छा पूरी हो गई थी और साथ ही उन देवगणों का भी कल्याण हो जायेगा। यही सब सोच गंगाजी शांतनु के महलों में रानी बनकर रहने लगीं। 

महाराजा शान्तनु का राज्य बहुत बड़ा था-उनकी राजधानी हस्तिनापुर थी। 

गंगाजी ने एक-एक करके सात पुत्रों को जन्म दिया। वह जैसे ही एक पुत्र को जन्म देती-वैसे ही उसे उठाकर गंगाजी में डाल आती। उस बेचारे की मृत्यु जन्म लेते ही हो जाती। 

राजा शान्तनु अपनी सन्तान को इस तरह बेदर्दी से मरते देख कर तड़प उठते। उनका मन खून के आंसू बहाने लगता। वह तो एक बाप था-जो अपनी सन्तान के लिए इस प्रकार से तड़प रहा था।


उन्हें बार-बार यह ख्याल आता कि उसकी पत्नी तो एक माँ है, जिसके सीने में ममता तड़पती है। उसे अपनी सन्तान का गला घोंटते हुए दुःख नहीं होता? वह क्यों नहीं रोती-वह कैसी माँ है?

सात.बेटों की हत्या करने वाली नारी ने न तो कभी आंसू बहाए और न ही अपने किए पर पश्चाताप किया- वह तो उसी प्रकार हंसी-खुशी से महलों में रहती थी।

वह ऐसा महापाप क्यों करती थी?


राजा उससे इसलिये नहीं पूछ सकता था...क्योंकि उसने शादी से पूर्व यह वचन दे रखा था कि मैं तुमसे किसी चीज के बारे में न तो पुछुगा और न ही रोकूंगा।


किन्तु...! हर चीज की एक सीमा होती है। मानव के हृदय में जितनी सहन शक्ति होगी- वह उतना ही सहन कर पायेगा। राजा शान्तनु ने अपने सात बेटों की हत्या होते देखी-यह दुःख अन्दर ही अन्दर उन्होंने पी लिया।

परन्तु जैसे ही आठवें बच्चे का जन्म हुआ-राजा ने अपने फूल से बेटे और हृदय के टुकड़े, देश के होने वाले राजकुमार को देखा। उसका चेहरा फूल की भाति खिला हुआ था।


"मेरा बेटा...मेरे जिगर का टुकड़ा कितना सुन्दर है...शक्ल से ही यह महाबली लगता है।" शान्तनु अपने बेटे का मुंह चूमने लगे...किन्तु साथ ही उन्हें ध्यान आया कि उनकी पत्नी इसे भी लेजाकर पानी में बहा आयेगी, इसकी भी मृत्यु हो जायेगी।


सारा शरीर पतझड़ के पत्ते की भाति कांप उठा था शान्तनु का।


उसने अपने बेटे को बड़े प्यार से देखा...फिर अपनी सुन्दर पत्नी को, जो विश्व सुन्दरी से कम नहीं थी-ऐसी सुन्दर नारी इस पृथ्वी पर नहीं थी। सुन्दर होते हुए यह पत्थर हृदय क्यों थी?


उसने उसकी आंखों के सामने ही सात बेटों की हत्या की, किन्तु वे उससे एक बार भी इसका कारण पूछने की हिम्मत न कर सके।


आज उनका आठवां बेटा भी मृत्युलोक में पहुंच जायेगा...उसकी भी हत्या कर दी जायेगी।


यदि वह अपनी पत्नी को रोकेंगे तो शर्त भंग होने का डर...और इसके साथ ही पत्नी के चले जाने की शर्त भी उन्हें याद थी।


गंगा ने अपने आठवें बेटे को भी गोद में उठाया और राजा के सामने ही उसे गंगा में बहाने चलने लगी।


इस बार राजा शान्तनु के धैर्य का बांध टूट गया। सात बच्चों की मृत्यु ने उन्हें तोड़कर रख दिया था-अब तो उनकी सहन-शक्ति समाप्त हो चुकी थी।


"कहां जा रही हो प्रिया?"

"राजन, क्या आपको यह भी याद नहीं कि मुझसे यह सब कुछ पूछने का अधिकार आप खो चुके हैं?"


"प्रिया...तुम मेरी पत्नी ही नहीं, एक माँ भी हो...क्या इस संसार की कोई माँ अपने बच्चों की हत्या अपने हाथों से कर सकती है? बहुत हो गया प्रिया-मैंने बहुत कष्ट सहन कर लिये-मेरे सात बेटे मेरी आंखों के सामने मारे गये-मैं सीने पर पत्थर रखकर सब सहन कर गया-क्योंकि मैंने तुम्हें वचन दे रखा था...किन्तु आज जो भी परिणाम निकले...जो भी कष्ट मुझे उठाने पड़ें, आज मैं शान्त नहीं रहूंगा...आज मेरे धैर्य का बांध टूट चुका है।


अब मुझमें यह शक्ति नहीं रही कि मैं इस फूल की मृत्यु अपनी आंखों के सामने देख सकूँ।"

“राजन!" 

"हां प्रिया!" 

"आपको मेरी शर्ते याद हैं न ?"

“मुझे सब कुछ याद है- पर कुछ भी याद नहीं...मुझे आज कुछ याद है तो यह अपना बेटा...बेटा तो यह तुम्हारा भी है...बाप से अधिक प्यार तो माँ के सीने में होता है...किन्तु न जाने तुम कैसी माँ हो! सच बताओ तुम कौन हो देवी? कहां से आई हो? क्या चाहती हो? क्यों अपनी ममता की हत्या कर रही हो?'


"हे राजन! तुमने आज अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी...तुम अपनी शर्त हार गये अब मैं आपके महल से अवश्य चली जाऊंगी। हमारा और आपका निर्वाह नहीं होगा...क्योंकि हम दोनों ने इस वचन का पालन करने की प्रतिज्ञा की हुई थी...अब मैं जा रही हूं तो राजन सुन लो...

मैं राजा जन्हू की कन्या गंगा हूं...मैं देवताओं के कार्य सिद्धि और उन्हें शाप से मुक्ति दिलाने के लिये आपकी पत्नी बनी-इन आठ देवताओं (वसुओं) को दुर्वासा जी ने शाप दिया था। इन सात वसुओं को तो मैं वापस देवलोक भेज चुकी हूं-आपका यह आठवां बेटा वसु ‘धू' है...जिसने दुर्वासा जी के गाय के बछड़े को चुरा लिया था...अब यह कुछ समय तक पृथ्वी पर ही रहेगा।


क्योंकि आपका वचन भंग हो चुका है- मैं इसे अब नदि में नहीं फेंकूगी। अब मैं आपसे विदा ले रही हूं और इस देवपुत्र धू को भी अपने साथ ले जा रही हूँ जिसे कि समय आने पर मैं आपको वापस कर दूंगी। हां, मैं वचन देती हूं कि यह बच्चा जीवित रहेगा।"


"गंगे...तुम...?"

राजा ने आश्चर्य से अपनी पत्नी की ओर देखा, जैसे उसे अपनी आंखों पर विश्वास ही न आ रहा हो।

"हां महाराज...आपकी पत्नी गंगा ही थी...जिसे आप नहीं पहचान पाये...मुझे खुशी है कि आज आपकी कृपा से मैंने सात वसुओं का तो कल्याण कर दिया है अब रह गया यह आठवां...

"बस इसका भी कल्याण हो ही जायेगा।" यह कहकर मां गंगा वहां से हवा बनकर उड़ गई।

राजा शान्तनु खड़े-खड़े सब कुछ देखते रहे उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा था...जैसे उन्होंने कोई सपना देखा हो।


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..... Mahabharat Ki Hindi Kahani: Raja Shantanu Aur Ganga Ji  .....


Team: The Hindi Story