Desh Bhakti Hindi Comics Story: Veer Vrishabh [Pdf]


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Veer Vrishabh Ki Kahani Pdf Comics

Desh Bhakti Ki  Hindi Kahani Comics: Veer Vrishabh
देश भक्ति की हिंदी कहानी कॉमिक्स: वीर वृषभ


पूर्वी तट पर कुजंग नामक एक छोटा- सा राज्य था। उसकी राजधानी प्रदीप नगरी थी। उसके शासक पराक्रमी थे, इस कारण वे वृषभ राजा नाम से प्रसिद्ध हुए । वहाँ की प्रजा का समुद्र तथा महा-नदी पर पूरा अधिकार था। राजा चन्द्रध्वज का दूसरा नाम वीर वृषभ था


ब्रिटीश लोगों ने क्रमशः भारत पर आक्रमण करते हुए इस छोटे राज्य पर भी अधिकार करना चाहा । इस पर राजा चन्द्रध्वज के नेतृत्व में कुजंग के नाविकों ने ब्रिटीश नौकाओं को खूब तंग किया


ब्रिटीश सेना ने कुजंग राज्य को घेर लिया । चन्द्रध्वज के सेनिकों के पास उत्तम प्रकार के आयुध न थे, फिर भी उन लोगों ने वीरतापूर्वक युद्ध किया; लेकिन अंत में वह दुर्ग ब्रिटीश सेना के अधिकार में चला गया


मगर राजा चन्द्रध्वज बन्दी न बना। थोड़े से अंगरक्षकों के साथ वह समुद्र के तटवर्ती घने जंगल में भाग गया।


ब्रिटिशियों ने कुजंग पर तो अधिकार कर लिया, लेकिन उन्हें उस प्रदेश में रहना कठिन हो गया। राजा चन्द्रध्वज को जैसे ही मौक़ा मिलता ब्रिटिशों के शिविरों में आग लगाकर उन पर हमला कर देते।


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वीर वृषभ: देश भक्ति की कहानी को कॉमिक्स के रूप में पढ़ें 

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Veer Vrishabh Desh Bhakti Hindi Comics Story


ब्रिटीशइयों ने समझ लिया कि चन्द्रध्वज को बन्दी बनाने पर ही उन्हें शांति मिल सकती है। एक दिन जंगल में चन्द्रध्वज अकेले ध्यान- समाधि में था, उस वक्त ब्रिटीशइयों ने गृप्तचरों की मदद से उसे बन्दी बनाया ।


बन्दी चन्द्रध्वज को कटक में लाकर महानदी के तट पर स्थित बाराबती के दुर्ग में क़ैद किया। लेकिन उसे बन्दी बनानेवाले उसके चारों तरफ़ घेरकर उसके मुंह से कहानियाँ सुन कर आनंदित होने लगे ।


अलावा इसके चन्द्रध्वज ने ब्रिटीश अधिकारियों को अनेक भारतीय खेल सिखाये | उन खेलों में उसे असाधारण प्रतिभा प्राप्त थी | इस प्रकार कई महीने बीत गये ।


एक दिन संध्या को महानदी पर एक सुंदर नौका दिखाई दी । उसमें डांड चलानेवाले कुल छत्तीस आदमी थे । उस नौका को देख गोरे साहब, उनकी पत्नियाँ और उनके बच्चे भी प्रसन्न हो उठे । ऐसी नौका को उन लोगों ने कभी न देखा था |

मलाह से पूछने पर उसने बताया कि वह नौका एक राजा की हैं, और राजा का देहांत हो गया है, इसलिए वह बिक्री के लिए तैयार है।


अधिकारियों ने मल्लाह से पूछा- "इस नौका का मूल्य क्या है?”

मल्लाह ने जवाब दिया-"इसका मूल्य तो कोई राजा ही बता सकते हैं, क्योंकि ऐसी वैभवपूर्ण नौकाएँ राजा लोग हीं बनवाते हैं।


उत्साह में आकर गोरे साहबों ने चन्द्रध्वज को दुर्ग से बाहर बुला लिया और उस नौका की जांच करने को कहा । इस पर चन्द्रध्वज नौका पर सवार हो गया |


फिर क्या था, एक साथ 36 डांडें चलीं। आँखें झपकने की देरी थी नौका नदी के मुहाने को पार कर नजरों से ओझल हो गई। तभी जाकर गोरे लोगों को असली बात का पता चला। इस प्रकार राजा चन्द्रध्वज को उसकी प्रजा तथा उसके मंत्री पट्टाजोशी ने ब्रिटिश कैड से मुक्त करवाया |


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Team: The Hindi Story

Indian History Story Hindi: Panna Ka Tyag | हिंदी कॉमिक्स [PDF]


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Panna Ka Tyag Hindi Kahani Comics 

Indian History Story Hindi: Panna Ka Tyag
इंडियन हिस्ट्री स्टोरी हिंदी :पन्ना का त्याग


राजस्थान के सुप्रसिद्ध राज्य मेवाड़ पर 16 वीं सदी में राणा सांगा शासन करते थे। वे बड़े ही उदार तथा शूरवीर थे


दुर्भाग्य से उनके पुत्र उनके समान बन न पाये । रत्न नामक राजकुमार एक युद्ध में स्वर्गवासी बना | दूसरा राजकुमार विक्रमजित अपने पिता की मृत्यु के बाद राजा बना और भोग विलासी बन उसने अपने धन तथा समय का दुरुपयोग किया ।


मेवाड़ में अराजकता फैल गई। मुग़ल बादशाह उस राज्य को हड़पने की सोचने लगे। उस हालत में कुछ प्रमुख दरबारियों ने वनवीर को अपना सरदार बनाया और उसकी मदद से विक्रमजित को गद्दी से उतारने का षड़यंत्र रचा। वनवीर असाधारण वीर पृथ्वीराज का नाजायज पुत्र था ।


वनवीर ने अचानक विक्रमजित पर हमला किया। विक्रमजित अपनी आत्मरक्षा न कर पाया और मृत्यु को प्राप्त हुआ। यह देख उसके मित्र भाग खड़े हुए ।


शीघ्र ही राजा की मृत्यु का समाचार राजमहल में पहुँचा। राजमहल दुख में डूब गया। 


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पन्ना का त्याग : इंडियन हिस्ट्री स्टोरी हिंदी की कहानी को कॉमिक्स के रूप में पढ़ें 

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Panna Ka Tyag Indian History Story Hindi Comics Story

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..... Bhartiya Itihas Ki Hindi Kahani: Baji Prabhu .....


Team: The Hindi Story

Bhartiya Itihas KI Kahani: बाजी प्रभु | Baji Prabhu Hindi Story

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Baji Prabhu Ki Kahani

Bhartiya Itihas Ki Kahani: Baji Prabhu
भारतीय इतिहास की कहानी: बाजी प्रभु

बात 1660 की है। वीर शिवाजी दिल्‍ली के मुग़ल बादशाह तथा मुगल साम्राज्य के दूसरे सूबों के शासकों की बगल में छूरी बन बैठे थे।  

शिवाजी पन्हाला दुर्ग में रहा करते थे। शिवाजी और उस दुर्ग पर अधिकार करने के लिए बिजापुर के सुलतान ने सलाबत खाँ को थोड़ी फ़ौज के साथ भेजा। कई दिन तक फ़ौज दुर्ग को घेरे हुए थे।

एक दिन शिवाजी के अनुचर सफ़ेद झंडे लिये हुए दुर्ग के बाहर आये और सलाबत खाँ से पूछा- आप किन शर्तों पर दुर्ग पर से अपनी फौज को हटायेंगे !

उधर शिवाजी के अनुचर सलाबत खाँ से मंत्रणा कर रहे थे, तभी शिवाजी बूढ़ें का वेष धारण कर अपने कुछ साहसी अनुचरों के साथ दुर्ग के पीछे वाले द्वार से भाग गये। थोड़ी दूर पर उनके लिए घोड़े तैयार थे

जब शिवाजी तथा उनके अनुचर अपने वेश बदलकर घोड़ों पर सवार हुए, तब दुश्मन के एक गुप्तचर ने उन्हें देख लिया। फिर क्‍या था, सलाबत खाँ ने अपनी फ़ौज़ के साथ उनका पीछा किया।

बाजी प्रभु :भारतीय इतिहास की कहानी को कॉमिक्स के रूप में पढ़ें 

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Baji Prabhu Bhartiya Itihas Ki Hindi Comics Story

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Team: The Hindi Story

Lokkatha Kerla Ki Hindi: डरपोक | केरल की लोककथा Folktale

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Lokkatha Kerla Ki Hindi: Darpok
लोककथा केरला की हिंदी: डरपोक


लगभग दो सौ वर्ष पुरानी बात है। केरल में तालंगोडू गांव में पार्वतम्मा नाम की एक महिला रहती थी। उसके पति का नाम रामकुट्टी था । रामकुट्टी राज दरबार में एक कर्मचारी था, जहां वह इतना व्यस्त रहता कि यह कह पाना  भी कठिन होता कि वह कब घर लौटेगा।


पार्वतम्मा अपना ज़्यादा समय भगवान सुबह्मण्य की पूजा में बिताती थी। वह सदा उसी की भक्ति में लीन रहती और उससे याचना करते हुए कहती, "स्वामी । तुम कब मुझे दर्शन दोगे? तुम कब मेरे हाथ से प्रसाद स्वीकार करने मेरे घर आओगे?"


एक दिन जब पार्वतम्मा हमेशा की तरह भगवान् के सामने याचना कर रही थी तो पुजारी भगवान् की मूर्ति के पीछे छिप गया और वहां से बला, "हे भक्तिन । मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं। आज सूर्यास्त के समय में तम्हारी यह याचना पूरी करूंगा।"


मंदिर में भगवान की आवाज सुनकर पार्वतम्मा खुश हो उठी । वह तुरंत अपने घर क ओर चल दी और भगवान को भोग लगाने के लिए तरह-तरह के पकवान तैयार किये। वह फिर प्रतीक्षा करने लगी।


शाम हो रही थी। इतने में उसे एक भिक्षक की आवाज़ सुनाई दी । वह पार्वतम्मा के घर के सामने खड़ा ज़ोर से "जय सुबह्मण्य" कह रहा था। उसे देखकर पार्वतम्मा को लगा कि शायद सुबह्मण्य स्वामी इसी रूप में आये हैं । वह उससे बोली, "पधारिए, पधारिए, स्वामी । यह मेरा अहोभाग्य कि आप मेरा आतिथ्य स्वीकार करने के लिए पधारे । 

यह सुनकर भिक्षुक बोला, "मैं एक साधारण भिक्षुक हूं, मैं भिक्षा लेने आया हूं।"

लेकिन पार्वतम्मा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि वह उसे घर के भीतर ले गयी । भिक्षुक को एक आसन पर बैठाया और उसके सामने पत्तल बिछाकर उस पत्तल पर थोड़ा-थोड़ा कर पकवान रखने लगी। भिक्षुक बड़े मज़े से उन पकवानों को खा रहा था । 


जब वह खा रहा था तो पार्वतम्मा ने भक्ति-भाव से ओतप्रोत होकर उसके गुणों का बखान करते हुए भजन गाने शुरू कर दिये। सूर्यास्त हो चुका था। इसलिए पार्वतम्मा ने जल्दी से दीप भी जला दिये । 


तभी बाहर दरवाजे पर खट-खट हुई । पार्वतम्मा दरवाज़े की ओर दौड़ी और देखा कि पुजारी बड़ी सज-धज कर खड़ा है और साक्षात् भगवान सुबह्मण्य दिख रहा है। 


पार्वतम्मा को अब अपनी गलती का एहसास हुआ । खैर, उसने तुरंत भीतर आकर उस भिक्षक को घर की टांड पर छिपा दिया।  टांड में पूरी तरह अंधेरा था।


अब पार्वतम्मा ने पुजारी को भीतर बुलाया और उसे भोजन करवाने लगी। वह उसकी सेवा में पूरी तरह से लीन थी।


इतने में बाहर घोड़े की टापों की आवाज़ सुनाई दी। देखा तो पार्वतम्मा का पति ही घोड़े से उतर रहा था।


अब उसे कुछ परेशानी-सी हुई। उसने जल्दी से पुजारी जो भगवान का वेश बनाये हुए था, को नमस्कार किया और उससे बोली, "स्वामी, मेरे पति को भगवान् में बिलकुल विश्वास नहीं। वह गुस्सैल भी बहुत है। जब तक वह सहज नहीं होते, तब तक आप कृपया टांड पर छिपे रहें।" और यह कहकर उसने पुजारी को भी टांड पर चढ़ा दिया ।


डरपोक केरल की लोककथा कहानी को कॉमिक्स के रूप में भी पढ़ सकते हैं 

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Darpok Lokkatha Kerla Ki Hindi Comics Story

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Kerla Lokkatha kahani Part-1

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Lokkatha Kerla Ki Hindi Part-2


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Lokkatha Kerla Folktale in Hindi Part-3


पुजारी को मजबूरी में उस टांड पर ही छिपना पड़ा। अंधेरा था, वह दुबककर एक कोने में लेट गया।


भिक्षुक तो वहां पहले से था ही। उसका पेट भी भरा हुआ था। उसे नींद आ गयी नींद में उसे यह भी पता न चला कि वहां पुजारी भी लेटा है।


पार्वतम्मा का पति जब भोजन करने लगा तो ढेर सारे पकवान देखकर उसे अचंभा हुआ। उसने पत्नी से पूछा," यह सब क्या है?  खीर , मिठाइयां इतना खाना !!!

पति के प्रशन का पार्वतम्मा ने इस प्रकार उत्तर दियाः "रात को मुझे सपना आया था कि आप आज आने वाले हैं। इसीलिए मैंने यह सब तैयारी की।"


पत्नी के उत्तर से पति खुश हुआ । अब वह खाना खा चुका था।वह आराम करने लगा तो उसे भी.नींद आने लगी।


आधी रात हुई तो भिक्षुक को बुरी तरह से प्यास लगी। वह जोर-ज़ोर से "पानी-पानी" कहने लगा।


पार्वतम्मा के पति की नींद खुल गयी। उसने पूछा, "यह आवाज़ कैसी है?"


पार्वतम्मा ने तुरंत उत्तर दिया, "हम पितरों को शांत नहीं करते न । इसीलिए वे इस तरह से चिल्ला रहे हैं।


पत्नी की बात पर पति ने विश्वास करते हुए अपने हाथ जोड़कर जोर से कहा, "हे मेरे बड़े-बुजर्गों, आइंदा आप जो भी कर्म कहेंगे, मैं उन्हें विधिवत पूरा करवाऊंगा।  इस बार आप हमें क्षमा करें।"


पर भिक्षक तो प्यास से बेहाल हो रहा था। वह और जोर से चीखा, "हाय, मैं प्यास से मरा जा रहा हूं।"


पार्वतम्मा ने टांड की ओर मुंह करके कहा, "हे भगवान् । पूर्व की दिशा में एक नारियल पड़ा है। वहीं एक पत्थर भी है। आप नारियल फोड़कर अपनी प्यास बुझा लीजिए।"


भिक्षुक ने पार्वतम्मा का संकेत समझ लिया। वहां पूर्व दिशा में वाकई एक नारियल पड़ा था। अंधेरे में उसे पुजारी का गंजा सर गोल पत्थर के समान लगा।

उसने उसी पर नारियल दे मारा।नारियल फूट तो गया, लेकिन साथ ही पुजारी का सर भी फट गया। 

"बाप रे।" पुजारी भी अब जोर-जोर से चीखने लगा। फिर दर्द से छटपटाते हुए अंधेरे में ही उसका हाथ भिक्षुक के हाथ पर जा पड़ा। दोनों अब आपस में भिड़ गये, और गुत्थम-गुत्था होने लगे। टांड पर अब काफी हलचल मच गयी। 


टांड पर हलचल की यह ध्वनि पार्वतम्मा के पति रामकुट्टी के कानों में भी पड़ी। वह डर गया। उसे लगा कि ज़रूर वहां प्रेतात्माएं हैं।


पार्वतम्मा ने इस स्थिति को भी संभालने की कोशिश की और अपनी आवाज में डर लाकर बोली, "उफ़, पितरों ने अब यह उग्र रूप धारण कर लिया है। मैं इनसे रोज प्रार्थना करती थी कि ये आपके लौटने तक शांत रहें । लगता है अब इन्हें पता चल गया है कि आप आ गये हैं।" 


इतने में लड़ते-लड़ते भिक्षुक और पुजारी टांड से नीचे आ गिरे। बड़े जोर की आवाज हुई। रामकुट्टी डर गया । उसे लगा कि उसके पितर उससे रुष्ट हैं। वह डर के कारण अपने होशो-हवास खो बैठा। वह गिरता-पड़ता जल्दी से अपने घर से बाहर की ओर दौड़ा और एकदम घोड़े पर सवार होकर उस पर चाबुक बरसाने लगा। लेकिन ताज्जुब कि वे चाबुक स्वयं उसकी अपनी ही पीठ पर पड़ रहे थे।


अब रामकुट्टी और भी घबरा गया । उसे विश्वास हो गया कि उसके पितर उसका पीछा कर रहे हैं। वह बड़े ज़ोर-ज़ोर से याचना करने लगा, "मुझे छोड़ दीजिए ।मेरे कर्तव्य-पालन में आइंदा कभी कोताही नहीं होगी। मैं आपको वचन देता हूं।"


इसी बीच पार्वतम्मा को मौका मिल गया। उसने तुरंत भिक्षुक और पुजारी को घर से बाहर धकेल दिया । पर हां, उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि जिस भगवान् की उसने इतनी आराधना की, उसी भगवान् ने उसे इतना विचित्र अनुभव क्यों दिया।


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..... Lokkatha Kerla Ki Hindi: Darpok .....


Team: The Hindi Story

Mahamall karnataka Ki Lokkatha: महामल्ल कर्नाटक की लोककथा


Mahamall karnataka Ki Lokkatha
महामल्ल कर्नाटक की लोककथा

बात पुरानी है। कर्नाटक भू-भाग के शुभवती राज्य में शंबल नाम के राजा का राज था। उसके यहां बड़े-बड़े वीर और मल्लयोद्धा, यानी पहलवान, रहते थे।

एक बार राजा शंबल के दरबार में महामल्ल नाम का एक पहलवान आया । वह कई राज्यों में कई पहलवानों को हरा कर पुरस्कार, उपाधियां प्राप्त कर चुका था। 

दरबार में पहुंचते ही महामल्ल ने राजा शंबल को संबोधित करते हुए कहा, "राजन्! आपके राज्य में यदि कोई मल्ल-योद्धा है, तो उसे बुलवाइए । मैं उसे कुछ ही मिनटों में हरा दूंगा । यदि आपके यहां ऐसा कोई योद्धा नहीं है, तो फिर आप अविलंब मझे अपने यहां की उपाधि तथा प्रशंसा-पत्र प्रदान करें।"

महामल्ल के गर्व भरे दावे को सुनकर सभी दरबारी सत्न रह गये। राजा की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या उत्तर दे।

तभी एक मंत्री एकाएक उठकर यूं बोला, "दयानिधान. । हमारे यहां के चंड-प्रचंड-दोदंड गोलमल्ल के सामने कोई भी मल्लयोद्धा टिक नहीं सकता । यह बात सभी जानते हैं । वह कहीं बाहर गया हुआ है। दो-एक दिन में आयेगा।


खैर, महामल्ल के लिए पूरे सम्मान के साथ राजमहल में रहने की व्यवस्था कर दी गयी। उसके कानों में मंत्री की बात बराबर गूंजे जा रही थी। वह गोलमल्ल के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त कर लेना चाहता था। इसलिए वह नौकरों से कुरेद-कुरेद कर सवाल पूछ रहा था ।


नौकरों ने उसे जो बताया, वह इस प्रकार था:"गोलमल्ल यहां के सभी मल्लयोद्धाओं के गुरु हैं । वह हमेशा योग साधना में लीन रहते हैं। वह तभी बाहर निकलते हैं जब राज्य की प्रतिष्ठा पर आंच आ रही हो। उनका शरीर वज्र के समान है।


दूसरे दिन महामल्ल के विश्रामकक्ष के बाहर एक और विश्रामकक्ष खड़ा कर दिया गया । उस विश्रामकक्ष का प्रवेश-द्वार काफी ऊंचा और चौड़ा था। उसे देखकर महामल्ल ने आश्चर्य मे भरकर नौकरों से पूछा, "यह क्या है?"


महामल्ल कर्नाटक की लोककथा कहानी को कॉमिक्स के रूप में भी पढ़ सकते हैं 

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Mahamall Karnataka Ki Lokkatha Hindi Comics Story

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Mahamall-karnataka- Lokkatha-Hindi
Karnataka Lokkatha kahani Part-1


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Karnataka Lokkatha Hindi Story Part-2


नौकरों ने कहा, "गोलमल्ल जी आने वाले हैं। वह विशाल शरीर वाले हैं। साधारण द्वार में से वह निकल नहीं पाते । इसीलिए इतना बडा द्वार बनवाया गया है।


उधर अपने मजदूरों से राज-मिस्त्री कह रहा था, "अरे, फर्श को अच्छी तरह दुरमुस से कूटो ताकि वह खूब पक्का हो जाये, वरना गोलमल्ल जी का पांव पडते ही वह धंस जायेगा और उसमें गड्ढे पड़ जायेंगे।


अब गोलमल्ल के लिए बड़े-बड़े बर्तनों में बादाम, पिस्ता, दूध, मक्खन आदि आने लगे। यह तमाम हलचल महामल्ल अपनी आंखों से देख रहा था। 


उसी शाम राजधानी में घोषणा हुई कि अगले दिन नये विश्रामकक्ष में गोलमल्ल जी प्रवेश करेंगे। फिर सुबह-सुबह एक विशाल बग्धी वहां आकर रुकी। उसे आठ घोड़े खींच रहे थे। वहां उपस्थित सभी लोग ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाने लगे, - "चडं-प्रचंड-दोदड गोलमल्ल की जय!"


गोलमल्ल का स्वागत करने के लिए वहां राजा शंबल स्वयं भी उपस्थित थे ।


कुछ ही देर बाद राजा के पास एक सैनिक आया और बोला, "अन्नदाता, महामल्ल अपने विश्राम-कक्ष में नहीं है। पहरेदार कहते हैं कि वह बिना कुछ कहे ही वहां से चला गया।


राजा का मंत्री भी वहीं पास ही खड़ा था। वह धीमे से मुस्करा कर बोला, "महाराज, हमने जो सोचा था, वैसा ही हुआ । महामल्ल हमारी गतिविधि से इतना भयभीत हो गया कि वह नगर छोड़कर भाग निकला । वह अब तक हमारे राज्य की सीमा भी पारकर चुका होगा।


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..... Mahamall karnataka Ki Lokkatha .....


Team: The Hindi Story

Kerla Ki Lok Katha: चतुर पत्नी | केरल की एक लोक कथा

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 Kerla Ki Lok Katha: Chatur Patni
केरल की एक लोक कथा: चतुर पत्नी

कोमन एक गरीब हजाम था। वह कडालुण्डी नाम के गाँव का रहनेवाला था जो जैमरिन राजा की राजधानी कोळिकोड के पास ही था। वह घुमन्तु हज्जाम था जो सुबह-सुबह अपने ग्राहकों के घर हजामत बनाने के लिए पहुंच जाता था। आजकल के सैलूनों के विपरीत जिसमें हज्जाम की कैंची और छूरा ग्राहकों के सिर पर या चेहरे पर चलते हुए देखने के लिए चारों ओर दर्पण लगे रहते हैं, कोमन या तो अपने ग्राहकों से ही शीशा माँग लेता था या अपने थैले में से एक छोटा-सा आइना निकालकर उन्हें दे देता था जिसमें वे देख कर तसल्ली कर लेते थे अथवा अन्तिम रूप देने के लिए कुछ निर्देश दे दिया करते थे।....


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केरल की एक लोक कथा: चतुर पत्नी कहानी को कॉमिक्स के रूप में भी पढ़ सकते हैं 

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Kerla Ki Lok Katha: Chatur Patni Hindi Comics Story

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Kerla Ka Lokkatha Hindi Story Part-1

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Lokkatha Kerla Ki Hindi Kahani Part-2


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..... Kerla Ki Lok Katha: Chatur Patni .....


Team: The Hindi Story


Bharat Ki Gatha: सरस्वती नदी और नचिकेता की कहानी

Bharat Ki Gatha: Sarswati Nadi Aur Nachiketa Ki Kahani
भारत की गाथा: सरस्वती नदी और नचिकेता की कहानी

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Nachiketa ke Teen Var Hindi Kahani

"क्या आपने यह खबर पदी है, ग्रैंडपा?" देवनाथ की ओर दौड़ कर आते हुए उत्तेजित स्वर में संदीप ने पूछा। देवनाथ छड़ी लेकर घूमने के लिए नदी किनारे की ओर जा रहे थे। सूर्यास्त होने ही वाला था और मोह लेने वाली मन्द-मन्द हवा चल रही थी। उस छोटे-से शहर पर एक खुशनुमा शाम उतरने लगी थी।


देवनाथ रुक गये। उन्होंने सारी जिन्दगी इतिहास पढ़ाया था और भारत के अतीत पर बहुत खोज की थी। उनके पास बहुत-से योग्य छात्र थे लेकिन उनमें से कोई भी अपने विषय में संदीप के समान जिज्ञासु नहीं था। वह अभी स्कूल में ही पढ़ता था लेकिन आसमान तले की हर चीज जानने का उसे शौक था। और भला क्यों नहीं, उसके ग्रैंडपा इतने अदभुत जो थे। एक प्रोफेसर, शिक्षाविद और विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में सेवा-निवृत हो जाने के बाद देवनाथ के पास अपने पोते की ज्ञान-पिपासा शान्त करने के लिए काफी समय था। यदि उन्हें बालक के प्रश्न का उत्तर नहीं मालूम होता तो वे स्वयं सीखना चाहते। 


चुनिन्दे ग्रंथों से समृद्ध प्रोफेसर के पुस्तकालय की दोनों मिलकर छानबीन करते। देवनाथ फ्रांसिसी चिंतक बॉलतेयर को बार-बार उद्धृत करते"जितना अधिक मैं पढ़ता है, उतना ही अधिक मनन करता हूँ। जितना ही अधिक मैं जानता हूँ, उतना ही मुझे यह लगता है कि मैं कुछ नहीं जानता।"


संदीप के मन में देवनाथ के प्रति गहरी श्रद्धा थी। उसे ग्रैंडपा के रूप में एक मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक मिल गया था।


"हाँ, मेरे बच्चे, मेरे लिए कौन-सा आश्चर्य लाये हो?" देवनाथ ने पूछा।


"ग्रैंडपा, हमलोगों के प्राचीन साहित्य में एक महान नदी सरस्वती का वर्णन आता है। लेकिन यह कहीं दिखाई नहीं देती। एक बार एक प्रसिद्ध वक्ता ने हमें यहाँ तक बताया कि ऐसी नदी का कभी कोई अस्तित्व था ही नहीं। लेकिन इस पत्रिका में एक रिपोर्ट छपी है कि लैंडस्टेट नामक उपग्रह ने उस नदी के मार्ग का फोटो लिया है। चौदह कि.मी. चौडी यह नदी हिमालय से बहती थी।"


"बिल्कुल ठीक मेरे बच्चे! इतना ही नहीं, कुछ और भी है। कुछ ही वर्षों पहले एक जाने-माने पुरातत्व वैज्ञानिक पॉल हेनरी फ्रैंक फर्त ने इस महान नदी पर पूरी तरह से शोध किया है। उसके विचार में यह नदी चार हजार वर्ष से भी पहले, शायद बहुत लम्बे समय तक सूखा पड़ने के कारण सूख गई; एक और नदी दृस्द्र्वती का भी यही हाल हुआ।"


'क्या यह कुछ अजीब सा नहीं लगता जब लोग यह कहें कि इनका अस्तित्व कभी था ही नहीं।"


"अजीब सा नहीं। वास्तव में हमलोगों को भारत के अतीत के बारे में बहुत कम जानकारी है। सैकड़ों वर्षो तक हम तामसिक जीवन जीते रहे। हमलोगों ने खोज, गवेषणा या अनुसंधान में पहल नहीं की। परन्तु पश्चिम के अध्ययनशील विद्वानों ने हमारे लिए बहुत कुछ किया। 


उन्होंने साँची जैसे स्मारक और अजन्ता तथा एलोरा जैसे कला के खजानों को ढूंढ निकाला। उन्होंने हमारी बहुत प्राचीन महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की खोज की और उनमें संकलित झान के बारे में हमें बताया। लेकिन साथ ही उन्होंने कुछ ऐसे सिद्धान्त प्रस्तुत किये जो असत्य निकले। उदाहरण के लिए, उन्होंने यह कहा कि आर्यों ने बहुत पहले भारत पर आक्रमण किया था और यहाँ के मूल निवासी द्रविड़ों से युद्ध किया था।


हमारे अपने इतिहासकारों और अध्यापकों ने इसकी सत्यता की जांच किये बिना उस सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया। हमारी इतिहास की पुस्तकों में यह सिद्धान्त पढ़ाया गया।


लेकिन आज कोई भी गंभीर विद्वान इस बात को देख सकता है कि इस सिद्धांत के समर्थन में प्रमाण का लेख मात्र भी नहीं। दूसरी ओर, इससे भारत को बहुत क्षति पहुंची। हमने अपने आप को दो भिन्न जातियों के रूप में देखा।" ग्रैंडपा ने संदीप को समझाते हुए बताया।


"ग्रैंडपा, जब नदी सूख गई तो इसके तट पर रहनेवाले लोगों की क्या दशा हुई होगी?"


ये दोनों अब नदी के किनारे-किनारे टहलने लगे। देवनाथ का उत्साह बढ़ गया। उन्होंने कहा "उन्हें संकट का सामना करना पड़ा होगा। किन्तु यह संकट अचानक, एक दम नहीं आया होगा। नये चरागाह की तलाश में वे थोड़े-थोड़े, करके कहीं और चले गये होंगे। यह एक विशाल देश था और स्थान का अभाव नहीं था। लेकिन सरस्वती नदी के किनारे जो संस्कृति और साहित्य उन्होंने विकसित किया, ये उनकी महानतम विभूति, हमारे देश के महानतम गौरव बन गये। वे वेद कहे जाते हैं।"


"क्या उन ग्रंथों को वे जहाँ-जहाँ गये, अपने साथ ले गये?"


देवनाथ मुस्कुराये और बोले,-"हाँ, वे वेदों को साथ लेकर जाते रहे- पर केवल अपनी स्मृति में। यद्यपि उन्हें लिखने की कला मालूम थी, फिर भी वे वेदों को कंठस्थ करने की विद्या का अभ्यास करते थे। और ध्यान रहे, चार-चार वेद-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्व वेद।


"अविश्वसनीय सन्दीप ने विस्मय के साथ कहा।


"अविश्वसनीय हम लोगों के लिए; लेकिन उनकी जीवन-शैली हमलोगों से विल्कुल भिन्न थी। मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि उस लुप्त सभ्यता का हर व्यक्ति वेदों को कंठाग्र कर सकता था। लेकिन जो ऐसा करते थे, वे ऋषि कहलाते थे यानी द्रष्टा और मुनि। वे समाज के शिक्षक थे। उन्हें धारणा यानी मन की एकाग्रता की शक्तियों की सिद्धि प्राप्त थी। वे वेद के स्तोत्रों का पाठ एक विशेष लय के साथ करते थे जिससे उन्हें न केवल शब्दों को याद रखने में बल्कि उनके शुद्ध उच्चारण और विराम में भी सहायता मिलती थी।"


"लेकिन वे इतना कष्ट क्यों करते थे, ग्रैंडपा?"


"मैं जानता था, तुम यह प्रश्न पूछोगे। संदीप जब हम किसी चीज के लिए कष्ट उठाते हैं तो हम किसी आनन्द या लाभ के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन कृषियों ने न तो आनन्द के लिए और न लाभ के लिए ऐसा किया। वे जिज्ञासु थे, सत्य के अन्वेषको वे जीवन की पहेलियों और आधारभूत समस्याओं का समाधान खोज रहे थे। हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है? मृत्यु के पश्चात हमारा क्या होता है? हमें दुख क्यों होता है? आदि आदि। उनका विश्वास था कि वेदों में इन सभी प्रश्नों के उत्तर हैं।


"लेकिन वेदों को किसने लिखा?"


"यह एक रहस्य है। जैसे हम पुस्तकें, रिपोर्ट या पत्र लिखते हैं, उस अर्थ में उन्हें किसी ने नहीं लिखा। ऋषियों ने उन्हें सुना। इसीलिए इन्हें श्रुति भी कहते हैं-यानी जो ज्ञान सुना गया हो। उनका विश्वास था कि चेतना के ऐसे उच्चतर लोक हैं जहाँ से प्रेरित शब्दों के रूप में मानव चेतना में सत्य उतर सकते हैं।


"काश वे सत्य मुझमें भी उतर पाते!'सन्दीप ने नकली गंभीरता के स्वर में कहा।


"ये भी हमारी तरह मनुष्य थे, संदीप! यदि उनके साथ ऐसा हो सकता था तो तुम्हारे साथ भी हो सकता है। नचिकेता तुम से बहुत छोटा था जब उसने मृत्यु के बाद के जीवन के रहस्य को ढूंढ निकाला।"


"नचिकेता! यह नाम परिचित-सा लगता है।"


"बस, इतना ही! क्या तुम्हें यह नहीं मालूम कि बहुत शताब्दियों से उसका नाम क्यों लिया जाता है?"


"शायद नहीं।"


"वेदों के बाद कई ग्रंथ आये जिन्हें उपनिषद कहते हैं। एक ऐसी ही उपनिषद् में, जिसे कठोपनिषद् कहते हैं, नचिकेता का वर्णन है। उसके पिता मुनि वाजवा यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ की पूर्णाहुति पर वे ब्राह्मणों को अपनी वस्तुएं दान दक्षिणा में दे रहे थे।


बालक नचिकेता ने यह सब ध्यान से देखा। फिर, अपने पिता के पास आकर बोला,"आपने मुझे किसे दान में दिया?"


उसने इस प्रश्न को कई बार दुहराया जिससे उसके पिता नाराज हो गये और क्रोध से बोले "यम को।"


नचिकेता चुपचाप यम के पास पहुँच गया, जो और कोई नहीं बल्कि मृत्यु के देवता हैं। परन्तु यम अपने निवास पर नहीं थे। नचिकेता तीन दिनों तक भूखा प्यासा उनके द्वार पर प्रतीक्षा करता रहा।


बालक की सचाई से प्रभावित होकर तीन दिनों तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने के बदले यम ने उसे तीन वरदान दिये।


"मेरे पिता मेरी अनुपस्थिति में चिंतित होंगे। उन्हें शान्ति प्रदान कीजिये।" नचिकेता ने पहला वरदान माँगा।


"तथास्तु।" यम ने कहा।


"मुझे स्वर्ग का ज्ञान बताइए।" नचिकेता ने दूसरा वरदान माँगा।

"तथास्तु।" यम ने कहा।


"मुझे मृत्यु का रहस्य बताइए। मनुष्य के देहान्त के पश्चात् आत्मा कहाँ जाती है? कृपया इसका ज्ञान दीजिए।" नचिकेता ने तीसरा वरदान माँगा।


यम को एक छोटे बालक से ऐसे प्रश्न की उम्मीद नहीं थी। "वत्स! मृत्यु और आत्मा का ज्ञान तुम्हारे लिए नहीं है। तुम कुछ ऐसी चीज मांगो जो तुम्हें प्रसन्नता दे सके-दीर्घ जीवन, समृद्धि और शक्तिा"


"हे करुणा निधान! इनमें से कुछ भी सच्चा सुख नहीं दे सकता। हमें वही ज्ञान दीजिए जिसके लिए मैंने प्रार्थना की है। केवल यही ज्ञान मुझे बचा सकता है।" नचिकेता ने आग्रह किया।


अन्त में, यम ने नचिकेता को आत्मा का ज्ञान प्रदान किया जो मृत्यु से परे है और जन्म-जन्म का शाश्वत यात्री है। नचिकेता प्रबुद्ध होकर घर लौटा और एक महान ऋषि के रूप में प्रख्यात हुआ।


"यम का निवास स्थान मालूम करना क्या उनके लिए संभव था?" संदीप ने विनोद के स्वर में पूछा।


"मेरे बच्चे। ऐसी कहानियों को केवल उनके कथानक की रूपरेखाओं से नहीं समझना चाहिए। इनके पीछे सच्चा भाव छिपा रहता है। ऋषि वाजश्रवा मात्र क्रोध करनेवाला या बेटे को शाप देनेवाला नहीं था। यदि इतना ही होता तो उपनिषद में इस प्रसंग के लिए कोई स्थान न होता। मैं समझता हूँ कि उसने अपने बेटे को एक दायित्व सौंपा। उसने मृत्यु के रहस्य पर ध्यान करने का कार्यभार दिया। 


नचिकेता ने उस समस्या पर तीन दिनों तक चित्त एकाग्र किया होगा। इस अवधि के अन्त में उसे यह रहस्योदघाटन हुआ होगा कि आत्मा अमर है।" देवनाथ ने कथा का विश्लेषण करते हुए समझाया।


"आश्चर्यजनक!" सन्दीप प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ा।

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..... Bharat Ki Gatha: Sarswati Nadi Aur Nachiketa Ki Kahani.....


Team: The Hindi Story

श्रीकृष्ण का दौत्य-२ | Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty

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Mahabharat Krishna Ka Hastinapur Aagmaan Ki Kahani

Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty-2
महाभारत स्टोरी हिंदी:  श्रीकृष्ण का दौत्य-२

स्तिनापुर में श्रीकृष्ण-आगमन का समाचार जंगल में आग की तरह फैल गया। धृतराष्ट्र को यह खबर जैसे ही मिली, उन्होंने भीष्म, द्रोण, संजय, विदुर तथा दुर्योधन को बुला भेजा। उनके आ जाने पर निर्देश देते हुए उन्होंने कहा, "आज हस्तिनापुर में कृष्ण आ रहा है, इसलिए उसके स्वागत में यहाँ के सभी मार्गों और वीथियों को तोरण और वन्दनवार से सजा दो। स्थान-स्थान पर आवश्यक सुविधाओं का प्रबन्ध कर दो। ध्यान रखो, उसके स्वागत-सत्कार में कोई त्रुटि न रहे।"


महाराज धृतराष्ट्र के आदेशानुसार दुर्योधन ने हस्तिनापूर के सभी मार्गों के अतिरिक्त वृकस्थल तक जाने वाले पथ को भी अलंकृत द्वारों और पताकाओं से सजा दिया।


श्रीकृष्ण इन सजावटों की ओर बिना ध्यान दिये हस्तिनापुर पहुंच गये। दुर्योधन को छोड़ कर धृतराष्ट्र के अन्य सभी पुत्र भीष्म और द्रोण के साथ अपने-अपने रथ पर उनके स्वागत के लिए आये।


श्रीकृष्णने धृतराष्ट्र के महल के सामने अपना रथ रोक दिया और पैदल ही उनकी राजसभा में पहुंचे। इनके पहुंचते ही धृतराष्ट्र सहित सभी राजे तथा अधिकारी इनके सम्मान में खड़े हो गये।


श्रीकृष्ण ने सबसे पहले भीष्म और धृतराष्ट्र से उनका कुशल-क्षेम पूछा। बाद में अन्य सभी राजाओं और उपस्थित व्यक्तियों से उनकी उम्र के अनुसार बातचीत की। 


धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण को स्वर्ण आसन पर बिठाया। श्रीकृष्ण ने उनका आतिथ्य स्वीकार किया और कुछ देर उनसे बातें कर, विदुर के घर चले गये।


उसी दिन अपराह वे कुन्ती से भी मिलने गये। उन्होंने श्रीकृष्ण को गले से लगा लिया और अपने पुत्रों का कुशल-क्षेम पूछते हुए कहा,"कृष्ण! मेरे पुत्र मुझे यहाँ अकेला छोड़ कर वन चले गये। जिन पितृहीन बच्चों को मैंने इतने प्यार से पाला था, भयंकर वन में उन्होंने अपना जीवन कैसे बिताया होगा। धर्मराज, भीम, अर्जुन सकुशल तो हैं? नकुल, सहदेव और कोमलांगी द्रौपदी कैसी हैं? मैं उन्हें कब देख पाऊंगी? तुम्हारे होते हुए भी धर्म परायण आत्माओं की यह दुर्दशा!'' यह कहते-कहते कुन्ती की आँखों में आँसू आ गये।


श्रीकृष्ण ने कुंती को सान्त्वना दी और कहा कि शीघ्र ही तुम्हारे सभी पुत्र, पुत्रवधू और अपने राज्याधिकार के साथ तुमसे मिलेंगे। थोड़ा और धैर्य रखो।


कुन्ती से विदा लेकर वे दुर्योधन से मिलने चले गये। दुर्योधन का महल इन्द्रपुरी के समान भव्य था। वह एक विशाल अलंकृत कक्ष में रत्नजटित सिंहासन पर गर्व के साथ बैठा हुआ था। दुःशासन, कर्ण और शकुनि भी उसके समीप बैठे थे। श्रीकृष्ण के आते ही सब के सब उठ खड़े हुए। दुर्योधन ने उन्हें उनके लिए विशेष रूप से सुसज्जित एक आसन पर बैठाया। 


श्रीकृष्ण ने दुर्योधन तथा वहाँ उपस्थित सभी से कुशल-मंगल पूछा। दुर्योधन ने उस रात अपने ही महल में भोजन और विश्राम कर आतिथ्य स्वीकार करने की उनसे प्रार्थना की। लेकिन श्रीकृष्ण ने अपनी विवशता बताकर उसकी प्रार्थना ठुकरा दी।


इस पर दुर्योधन ने पुनः अनुरोध करते हुए कहा,-"कृष्ण, तुमने तो निष्पक्ष रह कर कौरवों और पांडवों दोनों की सहायता की। इसलिए मैं हृदय से अपना आतिथ्य स्वीकार करने के लिए तुमसे प्रार्थना कर रहा हूँ। फिर क्या कारण है कि तुम इसे ठुकरा रहे हो?"


"मैं यहाँ दूत बन कर आया हूँ। और जब तक मेरा उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक तुम्हारा आतिथ्य नहीं स्वीकार कर सकता।" श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया।


"तुम्हारा उद्देश्य पूरा हो या न हो, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति में मेरा कोई योगदान होगा, ऐसी धारणा मत बना लेना। तुम हस्तिनापुर आये हो तो इसलिए, तुम्हें आतिथ्य-सत्कार और सम्मान देना हमारा कर्तव्य है। तुम्हें हमारा अनुरोध स्वीकार करना ही चाहिए।" दुर्योधन ने औपचारिक भाव से कहा।


दुर्योधन के मनोभाव को ताड़ कर श्रीकृष्ण मुस्कुराये और बोले,-"दो तरह के व्यक्तियों के साथ भोजन करने का आनन्द है। प्रेम करने वालों के साथ और विपत्ति में फंसे लोगों के साथ हमारे प्रति तुम्हारे हृदय में प्रेम नहीं है। अपने ही परिवार के पांडवों के प्रति तुममें जरा भी प्यार नहीं है। तुम उनसे अकारण द्वेष करते हो और अपना शत्रु मानते हो। उनके धर्मानुसार आचरण पर किसी ने उंगली नहीं उठाई। इसीलिए वे हमें प्रिय हैं। उनसे शत्रुता का अर्थ है मुझसे शत्रुता। सच तो यह है कि आतिथ्य के लिए मुझ से तुम्हारा अनुरोध ही अनुचित है।"


इतना कह कर श्रीकृष्ण वहाँ से उठकर विदुर के घर चल पड़े और वहीं भोजन किया।


भोजन के उपरान्त विदुर ने श्रीकृष्ण से कहा,"कृष्णा लगता है, यहाँ आकर तुमने ठीक नहीं किया दुर्योधन का मन सभी कर्तव्यों और मूल्यों को अलग रख कर सिर्फ युद्ध पर टिका हुआ है। कर्ण का दंभ है कि वह अकेला ही सभी पांडवों को परास्त करने के लिए काफी है। इसलिए यह शांति का विरोधी है। कर्ण के बल पर दुर्योधन भी युद्ध के लिए मचल रहा है। इसके अतिरिक्त उसकी सेना की शक्ति भी बहुत अधिक है। 


उसके पक्ष के राजे तुम्हारे पुराने शत्रु हैं। इसलिए वे सभी तुम्हारी हर बात का विरोध करेंगे, चाहे तुम कुछ उनके भले के लिए ही क्यों न कहो। यद्यपि तुम्हारी शक्ति पर मुझे पूरा विश्वास है, फिर भी मैं चाहता हूँ कि तुम उनके समझ जाओ ही नहीं।"


विदुर से सहमत होते हुए श्रीकृष्ण ने कहा,"मित्र के स्नेह के नाते तुमने ठीक ही परामर्श दिया है। तुमने जो कहा है, वही होगा भी। फिर भी, यह मेरा धर्म है कि शांति के लिए और उभय पक्षों को विनाश से बचाने के लिए मैं भरसक प्रयास करूं। हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाना उचित नहीं होगा। यदि ऐसा नहीं किया तो संसार मुझ पर यह दोषारोपण करेगा कि मैंने ही दोनों पक्षों को सर्वनाश की ज्वाला में झोंक दिया। जहाँ तक उनके सामने जाने से मुझ पर संकट आने का प्रश्न है, उसकी तुम चिंता मत करो।"


उस रात श्रीकृष्ण ने विदुर के घर पर ही विश्राम किया। दूसरे दिन प्रातःकाल दैनिक दिनचर्या से निवृत हो जैसे ही श्रीकृष्ण रथ की ओर बढे कि धृतराष्ट्र की ओर से दुर्योधन और शकुनि उन्हें राजसभा में ले जाने के लिए आ गये। उनके साथ अनेक राजा भी हाथियों व घोड़ों पर सवार होकर आये थे। उन सब के बीच राजमार्ग पर जाते हुए अपने रथ पर सवार श्रीकृष्ण ऐसे शोभित हो रहे थे मानो सितारों के बीच पूर्व क्षितिज-पट पर चन्द्रमा उदित हो रहा हो। इस मनोहर दृश्य को देखने के लिए स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभी मार्गों व घर के परकोटों पर उमड़ पड़े।


धृतराष्ट्र की राजसभा के मुख्य द्वार पर श्रीकृष्ण के संकेत पर सारथि दारुक ने रथ रोक दिया। सात्यिकी और विदुर के साथ श्रीकृष्ण ने सभा में प्रवेश किया। समस्त सभासदों ने खड़े होकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया और सम्मान के साथ विशिष्ट आसन पर बैठाया। विदुर और सात्यिकी ने इनके समीप ही अपना आसन ग्रहण किया।


सभा में थोड़ी देर तक मौन छाया रहा। सब की दृष्टि श्रीकृष्ण पर टिकी थी। श्रीकृष्ण ने बारीबारी से सबके ऊपर दृष्टि डाली। धृतराष्ट्र पर नजर पढ़ते ही उन्हें सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा,"यद्यपि कौरवों और पांडवों दोनों की ओर से युद्ध की तैयारियाँ हो चुकी हैं, फिर भी राजन! मैं पांडवों की ओर से आप के पास शांति का सन्देश लाया हूँ। पांडव यद्यपि शान्ति के पक्ष में नहीं हैं, फिर भी युद्ध की भीषण विभीषिकाओं को देखते हुए. मैं उन्हें शान्ति के लिए मना लूंगा।


"भारत के सभी राजवंशों में कुरु वंश सर्वश्रेष्ठ है और आप उस वंश के शीर्ष हैं। यदि युद्ध हुआ तो कुरुवंश के विनाश के साथ-साथ सभी राजवंशों का विनाश हो जायेगा और इसका कलंक आप पर लगेगा। यदि आप के वंश का कोई व्यक्ति अधर्म करे, नीति विरुद्ध कार्य करे तो उसे दण्ड देना आप का अधिकार और धर्म है।


"आप के पुत्रों ने धर्म की सारी मर्यादाओं को तोड़ दिया। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, उचित-अनुचित का विवेक खो दिया। पाण्डवों पर अमानवीय अत्याचार किये। वे समर्थ होते हुए भी मेरे कहने पर यह सब सहते रहे। यह सब आप जानते हैं। यदि युद्ध का विनाशकारी संकट आया तो इसका दायित्व कौरवों पर होगा। लेकिन आप चाहें तो कुरु वंश को बचा सकते हैं। आप चाहें तो कौरवों और पांडवों के बीच शान्ति की स्थापना कर सकते हैं। आप अपने पुत्रों को अनुचित और धर्म विरुद्ध कार्य करने से रोक सकते हैं। उन्हें सन्मार्ग पर चलने का आदेश दे सकते हैं। यह सब करने का अधिकार आप को है। आप उन्हें अपने न्यायपूर्ण आदेश का पालन करने पर बाध्य कर सकते हैं, आप उनके पिता और सम्राट हैं।


"पांडवों को युद्ध में कोई भी नहीं जीत सकता। वे अजेय हैं। यदि युद्ध नहीं हुआ और आपने पांडवों के साथ सन्धि कर ली तो इससे आप का ही हित साधित होगा। जब तक पांडव आप के साथ रहेंगे, तब तक आप इस पृथ्वी पर निष्कंटक राज्य करेंगे, क्योंकि उन्हें परास्त करने वाली कोई शक्ति अभी तक धरती पर नहीं उतरी। और यदि युद्ध हुआ तो आप को कोई लाभ नहीं होगा, चाहे कोई भी जीते। 


इस युद्ध में संसार के सभी राजा भाग लेंगे और युद्ध की ज्वाला में कीटों की तरह मर मिट जायेंगे। संसार वीरों से खाली हो जायेगा। आप चाहें तो संसार को इस विनाश से बचा सकते हैं।


“आप अपने पुत्रों को सन्मार्ग पर लाइ मैं पांडवों की क्रोधाग्नि को शान्त करूंगा। इस प्रकार शान्ति संभव है।


"फिर, पितृहीन पांडवों का आप के सिवा कौन अपना है! संकट के समय वे किसके पास जायें? वे भी आप के ही संतान हैं। वैसे भी उन्होंने आप का और आप के पुत्रों का क्या बिगाडा है? आप जानते ही हैं कि धर्मराज कैसा सरल हृदय है। लाख के महल में जलाया गया तब भी वह आप के पास आया। आपने उसे इन्द्रप्रस्थ भेज दिया तो वह चुपचाप चला गया। शकुनि ने उसे धोखे से छला फिर भी उसने अपने वचन का पालन किया।


"और अन्त में पूरी सभासे कौरवों और पांडवों के हित को ध्यान में रख कर याचना करता हूँ कि पांडवों के पिता का आधा राज्य न्याय और धर्मपूर्वक उन्हें लौटा दें और कुरु वंश के साथ-साथ सभी राजवंशों को सर्वनाश से बचा लें। और यहाँ उपस्थित सभी राजा एक साथ बैठकर प्रेम के साथ भोजन करें और पारस्परिक ईर्ष्या, द्वेष, घृणा और शत्रुता त्याग कर अपने-अपने राज्य लौट जायें।


"लेकिन यदि सभा ने अधर्म और अन्यायपूर्ण निर्णय लिया तो तजनित पाप के भागी ये सभी होंगे जो ऐसे निर्णय के साक्षी होंगे।


"मैं हर प्रकार से सोच-विचार कर ही ये बातें सम्पाट और उनकी सभा को बता रहा है। आगे सोचविचार कर निर्णय लेना आपके हाथ में है।"


श्रीकृष्ण इतना कह कर मौन हो गये। पूरी सभा में बहुत देर तक सन्नाटा छाया रहा।


कुछ देर के बाद परशुराम ने धृतराष्ट्र को सम्बोधित करके प्राचीन काल के अहंकारी राजा दम्बोद्भव का प्रसंग सुनायाः


दम्बोद्भव प्रतिदिन अपनी प्रजासे अपनी वीरता की डींग हॉकता और पूछता- 'मुझसे श्रेष्ठ योद्धा इस पृथ्वी पर कौन है?


ऋषि-मुनि उसे समझाते कि इतना अति आत्म-विश्वास घातक होता है। लेकिन उसे ज्ञान नहीं हुआ। अन्त में ऋषियों ने बता दिया कि गन्धमादन पर्वत पर रहनेवाले दो तपस्वी बडे भारी योद्धा हैं।


दम्बोद्भव अपनी सारी सेना लेकर गन्दमादन पर्वत पर पहुंच गया। दोनों तपस्वियों ने उसका स्वागत किया और आतिथ्य ग्रहण करने की प्रार्थना की। 


पर दम्बोद्भव ने दंभ के साथ उतर दिया- 'युद्ध ही हमारे लिए आतिथ्य है।' तपस्वियों ने फिर उसे समझाया कि यह प्रदेश तपोभूमि है और युद्ध के लिए उपयुक्त नहीं है। दम्बोद्भव तब भी उन्हें युद्ध के लिए, ललकारता रहा।


तब एक तपस्वी ने कुश का एक तिनका दम्बोद्भव की सेना पर फेंक दिया। उसकी सेना सो गयी और दम्बोद्भव शिथिल हो गया। उसका दम्भ जाता रहा और वह तपस्वी के चरणों में गिर कर माफी मांगने लगा।


'अपने प्रलापों को त्याग कर प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करो, तभी उत्तम राजा बन सकते हो।' इतना कह कर तपस्वी ने आँखें बन्द कर ली और फिर तपस्या में लीन हो गये।


वे दोनों तपस्वी नर और नारायण थे। जिसने कुश का तिनका सेना पर फेंका था, वे नर थे और दूसरे नारायण थे। वे ही नर-नारायण अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। अर्जुन गांडीव उठाये, उसके पहले ही अपना दंभ छोड़ कर उसकी शरण में चले जाओ। इसी में तुम्हारा और तुम्हारे वंश का कल्याण है। इतना कह कर परशुराम चुप हो गये।


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..... Mahabharat Story Hindi: Krishna Ka Duauty .....


Team: The Hindi Story

1857 की वीर गाथा | प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम | Rani Laxmi Bai Ki Kahani

 

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Rani Laxmi Bai ki 1857 ki Veer Gatha Ki Kahani | Pratham Swatantrata Sangaram

Rani Laxmi Bai Ki Kahani | Pratham Swatantrata Sangaram | 1857 ki Veer Gatha
१८५७.की वीर गाथा | प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम | रानी लक्ष्मी बाई की कहानी 

 पूरे देश में यत्र-तत्र क्रान्ति की आग धधक रही थीं। क्रान्ति के दो महान युवा नायक थे-झाँसी की रानी और नाना साहेब ब्रिटिस सरकार ने राजा की मृत्यु के बाद बिना कारण झाँसी का राज्य हड़प लेने का प्रयास किया था किन्तु रानी ने ऐसा होने नहीं दिया। उसने बहादुरी के साथ आक्रमणकारी ब्रिटिश सेना का सामना किया। किन्तु जब किले को बचाना संभव न रहा तो वह अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांध, पुरुष वेश में घोड़े पर सवार हो, अंग्रेजों की सेना से बचती हुई, किले के मुख्य द्वार से बाहर निकल गई।


रानी अपनी दो विश्वासपात्र परिचारिकाओं मन्दर और काशी के साथ आगे बढ़ती गई। छोटी परन्तु बहादुर सेना की एक टुकड़ी उनका पीछा कर रही थी। रानी को बार-बार पीछे मुड़कर पीछा करनेवालों का सामना करना पड़ता था।


वह निरन्तर, पूरे दिन, विश्राम किये बिना घोडे पर सवार आगे बढ़ती रहीं। उनका पहला गन्तव्य कालपी था। झाँसी से पिछली रात चल कर कहीं आधी रात को कालपी पहुंची।


नाना साहेब के चचेरे भाई और सच्चे देशभक्त रावसाहेब के महल के सामने मशाल लेकर सन्तरी पहरा दे रहे थे।


"रानी! झाँसी की रानी यहाँ!" सन्तरी आपस में फुसफुसा रहे थे।


राव सादेव ने बाहर आकर रानी का स्वागत किया। जैसे ही रानी घोड़े से उतरी, महल की स्त्रियों ने उनके सोते हुए पुत्र को संभाला। पुरुषों ने उनके घोड़े की लगाम ले ली।


आह लगता है घोडे ने पूरी निष्ठा से अपने स्वामी के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर दिया था। वह अचानक वहीं धम्म से गिर पड़ा और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण-पखेरू उड़ गये।


रानी ने घुटनों के बल बैठ उसे प्यार से थपथपाया। उनकी आँखों से आंसू टपक पड़े, मानो वे अपने मूक सेवक के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हों।


परन्तु रानी के पास विश्राम के लिए समय कहाँ था? सुबह होते ही वह राव साहेब के साथ रणनीति निश्चय करने के लिए बैठ गईं। रानी के गुप्तचरों ने समय से पूर्व यह सूचना दी कि झाँसी में सारा दिन लूट-मार और कल्लेआम करने के बाद भारत में ब्रिटिश राज के कर्णधार सर ह्यूग रोज के नेतृत्व में आधी सेना इसी ओर बढ़ी आ रही है।


रानी, राव साहेब तथा एक अन्य महान क्रान्ति नायक तात्या टोपे ने उस क्षेत्र के तीन-चार राजाओं-सामन्तों के सैनिकों को, जो इनकी सेवा में तैनात थे, एकत्र किया तात्या टोपे के नेतृत्व में ये सैनिक इसी ओर आती हुई अंग्रेजी सेना की दिशा में बढ़ने लगी कुंद गाँव में दोनों सेनाएं टकरा गई।


दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ दुर्भाग्यवश तात्या टोपे को अपने सैनिकों को एक अनुशासन में संगठित करने का पर्याप्त समय नहीं मिला था। इसलिए कुछ घण्टों के युद्ध के पश्चात इन्हें पीछे लौटना पड़ा। अंग्रेजी सेना ने कालपी में प्रवेश कर नगर को खूब लूटा। अपने कारखाने में बनी हुई बन्दूकों तथा बारूद के विशाल भण्डार से भरा राव साहब का शस्त्रागार सर ह्यूग रोज के लिए एक बड़ा तोहफा साबित हुआ।


अंग्रेजों ने इस विजय पर खूब खुशियां मनाई। किन्तु, रानी लक्ष्मीबाई, राव साहेब तथा तात्या टोपे में से किसी को भी बन्दी बनाने में विफल हो जाने के कारण वे निराश हो गये। ये तीनों नेता अपनी सेना का पुनर्गठन कर ग्वालियर पहुंच गये। ग्वालियर के राजा सिंधिया अंग्रेजों के समर्थक थे। लेकिन कुलीन और जन साधारण वर्ग के मन में क्रान्तिकारियों के लिए आदर-भाव था।


जैसे ही क्रान्तिकारी म्वालियर पहुँचे, राजा सिंधिया शहर छोड़कर भाग गया। रानी तथा इनके सहयोगियों का भव्य स्वागत किया गया। ट्यूग रोज ने इसे अपना घोर अपमान समझा। वह जानता था कि यदि सिंधिया को ग्वालियर वापस नहीं मिला तो अन्य राजा ईस्ट इण्डिया कम्पनी की, उनकी रक्षा करने की, शक्ति में विश्वास खो देंगे। भाग्य से झाँसी अब पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण में था। अंग्रेजी सेना का वहाँ रहना आवश्यक नहीं था। ह्यूग रोज़ ने वहाँ से सैनिकों को बुला लिया और एक बड़ी सेना संगठित कर ग्वालियर चल पड़ा। उसने सिंधिया को अपनी सेना का अगुआ बना दिया। यह चाल उसके लिए वरदान सिद्ध हुई। 


ग्वालियर की प्रजा ने क्रान्तिकारियों का स्वागत-सम्मान किया था। वे चाहते थे कि अंग्रेज हमारा देश छोड़ कर वापस चले जाएं। फिर भी अपने परंपरागत शासक के प्रति उनमें स्वाभाविक सहानुभूति थी। जब उन्होंने देखा कि अंग्रेजों से लड़ने का अर्थ है अपने राजा से लड़ना, तो वे निष्पक्ष हो गये। 


रानी ने बहुत बहादुरी और दृढ निश्चय के साथ अंग्रेजी सेना से मुकाबला किया। वह युद्ध में सदा अपनी सेना के आगे रहा करती थीं। दुर्भाग्यवश उनका विश्वासी घीड़ा पहले ही मर चुका था। जिस नये घोड़े पर वह सवार थीं, वह इनके युद्धाभ्यास की गतियों और युक्तियों से परिचित नहीं था, जबकि शत्रु बेरहम था। सर ह्यूग रोज एक कुशल और अनुभवी सेनापति था। अंग्रेज कप्तान इसके अधीन कई युद्ध लड़ चुके थे। फिर भी, रानी ने, जो सिर्फ २० वर्ष की थीं, उन्हें काफी समय तक घमासान युद्ध में उलझाये रखा। 


इनकी एक मात्र पूंजी जी थी-अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति। इनके सैनिक समर्पित अवश्य थे किन्तु अधिकांश प्रशिक्षित नहीं थे। इसलिए वे पेशेवर अंग्रेजी सैनिकों के चालबाजी भरे आक्रमण का सामना नहीं कर सके। यदि ग्वालियर इनका साथ देता तो स्थिति भिन्न हो जाती।


दोपहर के काफी बाद रानी के सेनाधिकारियों ने वापस लौट जाने की सलाह देते हुए कहा,"इस समय युद्ध में प्राण देने का औचित्य नहीं है। यदि आप जीवित रहीं तो आप के झण्डे के नीचे हमलोग फिर से संगठित हो सकते हैं।"


रानी उनके सुझाव का आदर करती हुई मन्दर, काशी और मुट्ठी भर सैनिकों के साथ युद्ध क्षेत्र छोड़ कर पीछे लौट पड़ीं। वह घोड़े पर सवार बहुत तेज रफ्तार में जा रही थीं। शत्रु सेना भूखे भेड़िये की तरह उनका पीछा कर रही थी। उन्हें मालूम था कि यदि रानी को जीवित या मृत पकड़ लिया तो मालिकों से उन्हें जिन्दगी का सबसे बड़ा इनाम दिया जायेगा।


रानी ने एक चौरास्ते पर आकर एक तंग गली में घोड़े को मोड़ दिया। पीछा करनेवालों को पता न चला कि वह किस दिशा में गई है। इसलिए वे टुकड़ियों में बँट कर चारों ओर फैल गये। रानी के अंगरक्षक अचानक रुक गये और पीछा करने वाले अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया।


रानी कुछ दूरी तर सुरक्षित भागती रहीं। शत्रु की दूसरी टुकड़ी के सिपाही उनका पीछा करते देखे गये। मार्ग में एक तंग नदी आ गई। रानी अपने पुराने घोड़े पर इससे अधिक चौड़े नाले को छलांग लगा कर पार कर जाती थीं। किन्तु नया घोड़ा उतना योग्य नहीं था। वह रुक गया और घबरा कर नदी के किनारे दुलकी चलने लगा।


तभी शत्रु के सिपाही निकट आ गये और रानी के सैनिकों पर टूट पड़े। मन्दर घायल हो गई। रानी नदी किनारे एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच गई थीं जहाँ पानी छिछला था और उसे आसानी से पार कर सकती थीं। लेकिन मन्दर की चीख ने उन्हें वापस लौटने पर बाध्य कर दिया। उन्होंने तलवार के एक ही बार में उसके आक्रमणकारी का काम तमाम कर दिया। फिर घोडे से उतर कर घायल मन्दर को संभाला। तभी एक कायर ने उनके सिर पर तलवार चला दी। रानी के अंगरक्षकों ने तुरन्त उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। फिर रक्त से लथपथ रानी को एक निकटवर्ती कुटिया में ले आये।


"मेरे बहादुरों!" मरणासन्न रानी धीमी आवाज में बोली, "मेरे प्राण निकलते ही मेरा दाह-संस्कार कर देना। शत्रु आने ही वाले हैं। मैं चाहती हूँ कि मेरे शरीर को स्पर्श कर वे इसे अपवित्र न करें।"


सचमुच अगले ही क्षण उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। उनके विश्वासी सेवकों ने सूखी पत्तियाँ और लकड़ियाँ एकत्र कर उनका अन्तिम संस्कार कर दिया।


इस प्रकार भारतीय इतिहास का एक चमकता सितारा सदा के लिए अस्त हो गया। इतिहास में इनके समकक्ष एक मात्र व्यक्तित्व था-जोन ऑफ आर्क।


जवाहर लाल कहते हैं-"एक नाम दूसरों से अलग थलग लोक-स्मृति में जो आज भी ताजा है, वह है झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, बीस वर्ष की एक बाला जो देश के लिए लड़ते-लड़ते जान पर खेल गई। विरोधी अंग्रेज सेनापति ने जिसके लिए कहा था,-"सर्वोत्तम और श्रेष्ठतम वीरांगना।"


यह क्रान्ति शीघ्र ही समाप्त हो गई, क्योंकि क्रान्ति के नायक एक-एक कर या तो बहादुरी से युद्ध करते हुए मारे गये या फाँसी के तख्ते पर झूल गये।


शूरवीरता, साहस, दूरदर्शिता और नेतृत्व-भारत में इन गुणों का कभी अभाव नहीं रहा। जिस गुण का यहाँ अभाव था, वह था-तात्कालिक राजाओं में एकता। उनमें एक दूसरे को नीचा दिखाने की एक जबरदस्त होड़ थी। उनमें कुछेक तो अपने ही देश के दुश्मनों और प्रतिद्वन्द्वी राजाओं से लड़ने के लिए विदेशी शक्तियों से भी मदद लेने में शर्म नहीं करते थे। इसके अतिरिक्त, अंग्रेजी सेना अधिक श्रेष्ठ थी और उसमें पेशेवर सैनिक थे, जबकि भारतीय सेना में स्वाधीनता के भाव से प्रेरित सामान्य जन थे जो युद्ध कौशल में प्रशिक्षित नहीं थे।


क्रान्ति समाप्त होते ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कप्तानों और सैनिकों ने भारतीयों पर निर्मम अत्याचार किया हजारों निर्दोष व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया गया और सैकड़ों गाँव जला कर राख कर दिये गये। महलों और किलाओं को बर्बरता से लूटा गया। अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को, जिन्होंने क्रान्तिकारियों को समर्थन दिया था, बन्दी बना कर रंगून निर्वासित कर दिया गया, जहाँ वृद्धावस्था और मायूसी में उन्होंने दम तोड़ दिया।


जो भी हो, ब्रिटेन की जनता और नेताओं ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की, इसके अनाचारों, नीचताओं और दुर्व्यवस्थाओं के लिए, खूब खबर ली। भारतीय प्रशासन की जाँच कराई गई। महारानी विक्टोरिया ने राजक्षमा की घोषणा की और भारतीय राजाओं के तात्कालिक अधिकारों को स्वीकार कर लिया।


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..... Rani Laxmi Bai Ki 1857 Ke Yudh ki Kahani .....


Team: The Hindi Story